Wednesday, December 1, 2010

चार दिन की चांदनी...

मुंबई की लाइफ लाइन कब मौत की रेख बन गई कहना मुश्किल।लेकिन इसके बारे में किसे दोष दे वो और भी कहना मुश्किल है आखिर वाकया क्या है उसे भी बता दूँ। मुंबई में कुछ सप्ताह पहले मुंबई के विक्रोली स्टेशन पर तीस से चालीस पुलिस सीटी बजा बजाकर रेल यात्रियों को पटरी पार करवा रहे थे। ये आखिर एक रेल फाटक था जहाँ से लोग बराबर एक तरफ से दूसरे तरफ आया जाया करते थे। दूर से नजर आनेवाली ट्रेन दिखते ही लोगो को पटरी पार करने से रोका जाता था। दो दिन बाद पुलिस की संख्या में कमी आ गयी पुलिस के जवान भी उन्हे मिले इस नए काम से उकता गये। धीरे धीरे पुलिस के जवान महज गिनतियों के रह गए। रोज रोज लगता कि कोई शैतान बिल्ली पुलिस के जवानों की संख्या में कमी कर रही है। एक सप्ताह के बाद आज पुलिस नदारद है और लोग बेखौफ पटरी पार कर रहे है। कोई रोकने वाला नही। दूर से आती ट्रेन को देखकर अगर किसी को रुपने का मन किया तो वो रुक गया भले ही दूसरा ट्रेन के साथ ही अपने रेस लगाकर आगे निकले की होड में रहे। इसतरह के वाकये को देख कर मन बरबस कुछ कहना चाहते इस लिहाज बस एक ही पंक्ति मिलती है कि लगा चार दिन कि चांदनी खत्म हो चुकी

पंद्रह दिन पहले मुंबई के विक्रोली स्टेशन पर रेल यात्रीयों और सामाजिक संगठन ने तीन से चार घंटो तक रेल रोक कर आंदोलन किया था। वजह थी कि यहाँ रेलवे ट्रैक पार करने के लिए पुल नही है, लोगों को चलती ट्रेन के साथ दौड लगाकर पटरी पार करके जाना पडता है। चार ट्रेक पर कभी कभी एक साथ ट्रेन आनेसे लोग असमंजस में पड जाते है और हादसे का शिकार होते है। एक ऐसे ही रविवार के दिन पटरी पार करने के चक्कर में ट्रेन का धक्का लगने कि वजह से तीन लोगों की मौत हो गयी और एक घायल हो गया। वैसे पटरी पार करते करते कई हादसे हो चुके है लेकिन एक दिन में हूई तीन मौतों की वजह से लोगों का गुस्सा भी फूट पडा कई सालों से वे पुल की मांग कर रहे थे लेकिन वही ढाक के तीन पात दर असल इसमें

रेल प्रशासन फिलहाल अपना पल्ला झाड रहा है लेकिन कम दोषी वो नहीं है, और लोग तो हैं अपने मन के राजा उन्हें भला ट्रेन की खौफ कहाँ, लोग पटरी पार करके जल्दी जाने की होड में लगे रहते है। उन्हे लगता है की सामने आनेवाली ट्रेन कि रफ्तार से भी जल्द वे निकल जाएंगे। मोबाईल फोन पर गाना सुनते सुनते रोड या फिर पटरी पार करने कि कई लोगों की आदत होती जा रही है हॉर्न का आवाज भी उन्हे सुनायी नही देता। जिसकी वजह से हादसों को न्योता लोग सामने से देते हैं। जिस तरह गलती लोगों की है उससे कहीं ज्यादा रेल प्रशासन की भी है। कई सालों से मांग होती रही फिर भी रेल प्रशासन अपनी जिम्मेदारी कॉरपोरेशन पर डाल रहा है और कॉरपोरेशन रेल प्रशासन पर लेकिन शिकार तो बन रहा है आम आदमी। चार दिन पुलिस बंदोबस्त रखकर लोगों को शांत करने का नाटक किया गया और आनन फानन में जनवरी तक पुल बनाने का आश्वासन भी दिया गया। लेकिन घडी की रफ्तार से चलनेवाले मुंबईकरों के जख्मों पर क्या सिर्फ चार दिन का मरहम ही काफी होगा। कुछ सरकार करे या ना करे लेकिन लोगों को तो इस तरह का छलावा तो ना दे इसके खिलाफ हम सभी को बोलना होगा मानते हैं हम भगवान के हाथों खिलौना हैं लेकिन सरकार तो चार दिन चांदनी का जलवा दिखा कर नौटंकी तो ना करे। आवाज तो उठानी ही होगी...एक स्वर आप अपना भी मिलाएँ....।

Tuesday, November 30, 2010

चुप्पी तोडो।

दो सगी बहनें, उनकी चार मौसेरी बहने और एक नौकरानी जिनमें से एक बालिग और बाकी सभी नाबालिग है। सभी बहने अभी अपनी पढाई पूरी कर रही है। इसमें से एक बहन कॉमर्स की पढाई कर रही है तो दूसरी डॉक्टरी पढ रही है। पढे लिखे परिवार की इन सभी बेटियों के दामन को दागदार कर दिया गया है । इसमें से एक बहन का एक बार और दूसरी का दो बार जबरन गर्भपात कराया गया है। उच्च शिक्षित परिवार और सभ्रांत इलाके में रहनेवाली इन बहनों को किसी ने अपने प्रेमजाल में फसां कर उन्हे हैवानियत का शिकार ही नही बनाया बल्कि ये खुद अंधश्रध्दा के खाई में गिरकर अपने आप को बर्बाद कर चूकी है। दरअसल घरेलू समस्या का समाधान ढूंढने के लिए तांत्रिक की मदद ली गयी। उनका विश्वास जीतने के लिए उस तात्रिक ने उन्हे घरेलू समस्या से निज़ात भी दिलवाया। मौसी के घर की समस्या को भी हल कर दिया । दो सगी बहनों के भाई अपाहिज है, उसे ठीक करने की लालच देकर और आंशिक रूप से अपाहिज औलाद होने की समस्या इन बच्चियों तक ना पहूंचे इसलिए वो वहशी तांत्रिक इलाज करने के बहाने उनके घर पर आया करता था। भाई के ठीक होने की आस में उन्हे दी जानेवाली नशे की दवाई भी वो पीने के लिए मजबूर हो जाती थी। ऐसा नही था कि ये सारी खबर बच्चियों की मां को पता नही, उनकी ही रजामंदी से बच्चियों पर तात्रिक से इलाज करवाया जा रहा था। पहले तो नशे की हालात में इन बच्चियों को पता नही चल पाता था कि उनके साथ क्या हो रहा था। जब पता चला तब देर हो चूकी थी। सारी बच्चियों पर इलाज के बहाने बलात्कार किया जा रहा था, और उनमें से दो बच्चियों का गर्भपात भी कराया गया । पिछले चार साल से यह वहशी तांत्रिक नाबालिग बच्चियों के शरीर को नोंच रहा था। राज को खोले जाने पर तंत्र मंत्र का डर दिखाया करता था। चार साल के बाद आखिरकार इन बच्चियों में से एक लडकी के सब्र का बांध टूट गया और आखिरकार उसने पुलिस में उस नरपिशाच तांत्रिक के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी। शिकायत के बाद पुलिस ने उस तांत्रिक पर शिकंजा कसते हुए उसे सलाखों के पीछे भेज दिया है और उसके घर से एक करोड रूपये की नगद और जेवरात बरामद किये है। अंधविश्वास की खाई में गिरकर सात बच्चियों की जिंदगी आज बर्बाद हो गयी है। शिक्षित होने के बावजूद भी परिवार ने अंधविश्वास का सहारा लिया। डॉक्टर से इलाज कराने की बजाय ढोंगीबाबा का सहारा लिया गया। वहशी तांत्रिक ने इज्जत भी लूटी और पैसे भी। हाल ही में ठाणे जिले के मीरारोड में भी इसी तरह का वाकया हुआ था। जहां तांत्रिक बाबा के झांसे में आकर पिता ने ही अपनी बेटी के साथ शारिरिक संबंध बनाये थे और बहकानेवाले तांत्रिक ने भी। समाज में तंत्र और मंत्र का डर इतना फैलाया गया है कि कोई भी अच्छा खसा पढा लिखा इंसान बहकावे में आ जाता है। समाज में अंधविश्वास की जडे दिन ब दिन मजबूत होती जा रही है। समाज में फैले अंधविश्वास के जहर को समय रहते खत्म नही किया गया तो सारा समाज जहरीला हो जाएगा । समाज की सारी महिला और खासकर लडकियों से यह विनती है कि इस तरह के गलत तरीके का इस्तेमाल होने से अपने आप को बचाये। आप आस्तिक है तो भगवान में श्रध्दा रखिए और मानसिक रूप से स्वस्थ हो जाए। आपको या घर में किसी को भी शारिरिक पीडा हो तो डॉक्टरी सलाह लीजिए , लेकिन कतई इस तरह के तंत्र और मंत्र का सहारा ना लें। अपने आप पर होनेवाले अत्याचार के खिलाफ जरूर आवाज उठाये चुप्पी तोडें और अपने साथ हो रहे अन्याय को सामने लाए....जीवन बेहद मूल्यवान है अगर इस तरह बरबाद करेंगे तो परिवार से पहले आप अपने आप का नुकसान करेंगे। आधी अबादी हमारी अपनी है तो क्यों इन पाखंडियों के चंगुल में हम फंसे है.....।

Monday, November 29, 2010

जारी है सिलसिला

बिजली बिल भरने की कतार में मै खडी थी मेरे आगे एक महिला खडी थी उसने बील जमा करनेवाले से कहा की मुझे इस महिने दूगना बिजली बिल आया है, बावजुद मैने पिछले महीने बिल जमा कर दिया था। उस व्यक्ति ने बिल देखकर कहा की मां जी यह बिल सिर्फ एक महीने का ही है और बिजली के दाम दूगने बढ गये है। वह महिला कहने लगी, कि घर में कमानेवाले कोई नही है कहां से भरेंगें इतना बिल। मेहनत मशक्कत करने के बावजूद खाने पीने के लाले है । एक ओर महंगाई बढती ही जा रही है और दूसरी ओर भ्रष्टाचार थमने का नाम नही ले रहा है। मुंबई में कोलाबा की छह मंजिला इमारत की फाईल सरकारी बाबूओं और मंत्रीयों के हाथो के नीचे से गुजरते गुजरते 31 मंजिला बन गई, और सभी को फाईल मंजुर करने के लिए एक एक प्लैट मिल गया। शहिदो के परिजनो के लिए बननेवाले आशियाने को सरकारी बाबू और मंत्रीजी डकार गये। वहीं देशभर में भ्रष्टाचार का बोलबाला है, दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ खेलो का घोटाला, टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला और वहां दक्षिण में येदीयुरप्पा ने अपने बेटो को खैरात में जमीने बांट दी उसमें हुआ करोडो रूपयों का घोटाला, और अब हालहि में उजागर हूआ होमलोन घोटाला जहां करोडो रूपयो के वारे न्यारे हुए है। होमलोन और कॉरपोरेट लोन पास करवाने के लिए भी रिश्वत करोडे रूपयों ली गयी थी। देश में मानो घोटालो की लहलहाती फसल आ गयी है और चाहे वो अफसर हो या राजनेता हाथो में हसिंया लेकर अपनी अपनी बोरीयां बांध रहे है। वहीं रतन टाटा ने भी उनसे मांगी गयी रिश्वत का जिक्र करते हुए कहा कि वो एविएशन में आना चाहते थे लेकिन उनसे एविएशन मिनिस्ट्री के अधिकारीयों ने पंद्रह करोड रूपये की रिश्वत मांगी थी। घोटाले अब हजारो या लाखों में नही बल्कि करोडो में हो रहे है, और करोडो रूपयों का घोटाला ना हो तो मिडीया उसमे दिलचस्पी ही नही दिखाती। इसी घोटाले के देश में किसानो और मजदूरों के लिए दो- पांच रूपये भी मायने रखते है चवन्नी -अठन्नी जमा करके फसल उगाने वाले किसान ने बे मौसम आयी बरसात के चपेट में अपनी अच्छी खासी फसल को बर्बाद होते हुए अपनी आंखो से देख रहे है। बर्बाद हुए फसल का हर्जाना पाने के लिए उन्हे दर दर की ठोकरे खानी पड रही है। लालफिताशाही के चलते अब तक किसानों की बर्बाद फसलों का मुआयना भी नही हो पाया है , मुआवजा तो सपना लगता है। समाज में दो भाग साफ साफ नजर आ रहे है। एक और घोटाले में लिप्त भ्रष्ट अधिकारी और मंत्री तो दूसरी ओर अपने अधिकार से वंचीत समाज। एक ओर अमीर और अमीर होता जा रहा है,वहीं दूसरी ओर गरीब और भी गरीब । आम इंसान को अपने हक के लिए दर दर की ठोकरे खानी पड रही है, छोटा काम करवाने के लिए भी दफ्तरों में चक्कर लगाते लगाते समय निकल जाता है। घूस ना दे तो महिनो तक बात बनने से रही। सरकार बदले या फिर मंत्री या अधिकारी ही बदल दिए जाए भ्रष्टाचार की जडे इतनी मजबूत हो गयी है की उसे जड से उखाडना असंभव है। चंद लोगो का भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना याने शोर के बीच में अपनी आवाज सुनाना लगता है। भ्रष्टचार न थम सकता है ना इसे बढने से कोई रोक पायेगा। मंत्री या अधिकारी के फेरबदल से उन्हे नसीहत तो जरूर मिलेगी लेकिन वो और भी सजग और चौकन्ने होकर भ्रष्टाचार को अंजाम देगें। जरूरत है सबों को इसके खिलाफ एकजूट होने की। तभी हम एक नये सवेरा की उम्मीद कर सकते है।

Thursday, October 28, 2010

बेदिल मां.....

एक मां ने अपने एक महिने के बेटी को कुडेदान में फेंक दिया और खुद को तिमारदारी से मुक्त कर लिया। यह सारा वाकया सिसिटिव्ही कॅमरे में कैद हो चुका है सारे देश ने भी देख लिया होगा। सात महिने में पैदा हुए दो जुडवा बच्चे एक बेटा और एक बेटी , दोनो को सांस लेने में तकलीफ होने की वजह से उन्हे मुंबई के के.ई.एम अस्पताल में दाखिल करवाया गया। बच्चों की तिमारदारी से और शायद उन्हे हो रही तकलीफ मां से देखी नही जा रही थी। लेकीन एक बेदिल मां ने ही बच्चों को हो रही तकलीफ से निजात देने के लिए उनके मुक्ती का रास्ता ढूंढ लिया। अस्पताल में रात को जब सभी सो गये तब उसने दो जुडवा बच्चो में से बच्ची को लेकर टॉयलेट के खिडकी से बाहर कचरे में फेंक दिया। रात में चुंहों ने उस नवजात को नोंच नोंच के खाना शुरू कर दिया जिसके चलते बच्ची की मौत हो गयी । फिर किसी को खबर ना लगे इसलिए उसने बच्ची चोरी हो जाने का नाटक करके शोर मचाया। लेकीन उसकी चोरी पकडी गयी। लडके और लडकी में से सिर्फ लडकी को चुना गया मारने के लिए। कुल के दीपक को वो मां कैसे मारती जो उनके बूढापे का सहारा बननेवाला था। दो बेटे होते तो वो मां क्या करती। कैसे साहस हुआ होगा उस मां का जिसने बच्ची को खिडकी से बाहर फेका होगा। आज वो मां सलाखो के पिछे है लेकीन उसकी मानसिकता का अंदाजा नही लग पाया है। पुरूष प्रधान संस्कृती में आज भी कन्या की हत्या की जा रही है जिसे परिवार का समर्थन ही मिल रहा है। इस बेदिल मां के भी पिछे उसका परिवार खडा है उनका कहना है की वो सारा किस्सा भुलाना चाहते है और अपने बहू और पोते को वापस लाना चाहते है। स्त्री भ्रुण हत्या का सिलसिला आज भी जारी है। सोनोग्राफी करके पता लगाया जाता है लडका हुआ तो ठिक लेकीन लडकी हुई तो उसका गला पेट में ही घोटा जाता है। लडकीयों की संख्या दिन ब दिन कम होती जा रही है। राजस्थान, गुजरात, यु,पी बिहार में बचपन में ही शादी करवाने का सिलसिला आज भी जारी है। शहर में लडकीयां पढ- लिखकर अपने पैरों पर खडी हो रही है लेकीन देहात में नजारा कुछ और ही होता है। अगर घर में बडी लडकी हो तो चुल्हा – चौका ,भाई- बहनों का संभालने का जिम्मा उन्ही पर होता है, घर के सारे काम काज करनेमें ही सारा वक्त निकल जाता है ना पढाई ना लिखाई। 21 वी सदीं में भी आज नारी को अपने अस्तित्व की लडाई के लिए पुरूषों पर ही निर्भर रहना पड रहा है, चाहे वो पिता हो चाहे भाई या पती। आज एक मां का बेदिल रूप देखने मिला ऐसे अनगिणत मां होंगी जो किसी ना किसी दबाव के चलते अपने बच्चों की बली देने पर मजबूर होती है, लेकीन कन्या की हत्या के पाप में वे बराबर की शरीक है क्योंकी नौ महिने अपनी कोख में बच्चे को रखकर उसको प्यार का स्पर्श देकर पालन पोषण करनवाली मां को पुरा अधिकार है की वो ऐसे दुष्कृत्य को रोके। भगवान को सब जगह रहना नामुमकिन था इसलिए उसने मां बनायी। भगवान का रूप होनेवाली मां बेदिल कैसे बन सकती है।

Wednesday, October 27, 2010

ठाकरे परिवार में महाभारत

कल्याण- डोबींवली महानगर पालिका चुनाव के कुरूक्षेत्र में अब ठाकरे परिवार के बीच जंग की शुरुआत हो चुकी है। महापालिका चुनाव के अखाडे में चाचा और भतीजे ने अपनी तलवार की धार तेज कर दी है। वार- पलटवार का सिलसिला यूं तो कई दिनो से जारी है लेकिन सोमवार को डोंबिवली में हुई सभा में भतीजे ने अपने भाषण में चाचा को खूब खरी खोटी सुनाई उसका बदला लेने में चाचा भी पीछे नहीं रहे, बदले में तीखी और धारदार आलोचना ही कर डाली । राज ठाकरे बनाम बालासाहब ठाकरे शीत युद्ध अब शब्दबेधी वाण का शक्ल ले चुका। पिछले काफी दिनों से थोडा स्थिर था लेकिन अब मुखर हो गया है। दशहरा रैली के दौरान शिवसेना सुप्रीमों ने राज ठाकरे पर निशाना साधते हुए राज को कॉपी कॅट कहा और उनकी नकल उतारकर लोगो को बरगलाने का आरोप भी किया साथ ही यह भी साफ कर दिया की शिवसेना कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उध्दव ठाकरे का चुनाव खुद राज ठाकरे ने ही किया था। ठाकरे परिवार में वंशवाद नही होने का दावा करनेवाले बालासाहब ने अपने पोते को तलवार देकर युवासेना की स्थापना करने के लिए शुभ आशिर्वाद भी दिया। चाचा के नक्शे कदम पर चलनेवाले भतीजे ने यह स्वीकार किया कि उनका लहजा , बोलने का तरीका बालासाहब जैसा ही है क्योंकि बचपन से ही वे बालासाहब के साथ हर सभा में जाते थे, उन्हे सुनते थे। उनके दिए हुए संस्कार को वो आज भी निभा रहे हे। राज ठाकरे ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि चाहे कुछ भी हो जाए बालासाहब उनके लिए पूजनीय थे, है और रहेंगे। लेकिन राज ठाकरे ने बालासाहब को भी कॉपी कॅट होने का आरोप लगाया और कहा कि वो भी मेरे दादाजी की कॉपी करते है। साथ ही यह भी आरोप लगाया की उन्हे शाखाप्रमुख चुनने का अधिकार नही था। बालासाहब ने शब्दों के अनेक अस्त्र चलाकर ठाकरे परिवार में छिडी जंग को स्वीकार किया और राज ठाकरे की सरेआम धज्जियां उडायी। बात तो वही होने लगी जो नाना पाटेकर ने अपने डॉयलग में कहा था,यही वाला साहव ने भी बोला... बच्चा समझ के कंधे पर उठाया तो कान में .........। जिस बच्चे को कंधे पर घुमाया अपने हाथों से खाना खिलाया आज वही हमारे नाम से चिल्ला रहा है। शिवसेना की दुहाई दे रहा है, उसी शिवसेना के बलबुते ये चूहों की सेना चींची करती नजर आ रही है। लातों के भूत जिस तरह बातों से नही मानते उसी तरह मनसे अध्यक्ष का भी समाचार लेना लाजमी हो जाता है। ठाकरी भाषा से हर कोई अवगत है, और उनके इसी लहजे को सुनने के लिए लाखो लोग जुटते हैं, जिसे आम भाषा में मास अपील की संज्ञा देते हैं। लेकिन एक मराठी माणूस चाहे वो शिवसैनिक हो या मनसैनिक हो इस घडी में दुविधा में है। ठाकरे परिवार का पारिवारीक कलह पब्लीक मंच से घर घर तक पहुच चुका है। सत्ताधारी एनसीपी और कांग्रेस नेता भी खूब मजे लेकर परिवार की उडती धज्जियां को गिना रहे है। राजनीति में इस तरह के वाकये होना लाजमी है।लेकिन आशा भंग तब हो रहा है जब मराठी माणूस के अधिकार के लिए लडनेवाले दोनो ही ठाकरे आज आपस में लड रहे है। जिस मराठी माणुष के कल्याण के लिए शिवसेना और मनसे का गठन किया गया था वो आज वंशवाद के मुद्दे पर एक दूसरे की बखिया उघेडने में लगे हैं। लोगों मे आज मजाक का विषय बनते जा रहे है, लोग अब भ्रम में पड चुके है किसका साथ निभाये, किसके साथ जाए। कौन उनकी समस्याएं दूर करेंगा। राजनीति और सत्ता में कोई किसी का नही होता लेकिन आम आदमी के कल्याण का बीडा उठानेवाला ठाकरे परिवार अब अपने अस्त्र एक दूसरे पर नही बल्कि आम आदमी को न्याय दिलाने के लिए उठाये तो बेहतर होगा ताकि जिस उम्मीद से ठाकरे परिवार के साथ लोग जुडे है उनकी उम्मीदों और इच्छाओं पर पानी ना फिर जाए। अंदरूनी राजनीति जानने में आम इंसान को कोई सरोकार नही होता उसे तो चाहिए बस इंसाफ। वो तो कहता है हम क्या जाने नेता कौन कौन हमारा तारणहार हमें बसे दे दो जीने का अधिकार।--

Saturday, October 23, 2010

शिक्षीत दुराचारी

भगवान के बाद ज्यादातर लोग डॉक्टर को तारणहार के रूप में देखते है। जीवन देनेवाला डॉक्टर भगवान की तरह पूजनीय हो जाता है । कई डॉक्टरों ने मरीजों को मौत के मुंह से निकाल लाया है। नवी मुंबई स्थित वाशी का एक डॉक्टर मरीज का तारणहार नही बन पाया इसलिए आज वो सलाखो के पिछे है। लो बीपी की शिकायत होने की वजह से एक महिला को अस्पताल में दाखील कराया गया । दुराचारी डॉक्टर ने उसकी तबीयत नाजुक होने का बहाना बनाकर उसे ICU मे दाखील करने का सुझाव दिया। महिला को सलाईन मे नशे की दवा देकर सुलाया गया। तडके चार बजे जब महिला को होश आया तो डॉक्टर ने चेक-अप करने के बहाने उसे सारे कपडे उतारने कहे फिर उसे नशा का इंजेक्शन देकर उसपर बलात्कार किया। नशे की हालात में वो महिला ना विरोध कर पायी ना ही चिल्ला पायी । महिला का पती ICU के बाहर रातभर बैचेन घुमता रहा । सुबह महिला के बताने के बाद वैहशी डॉक्टर को सलाखो के पिछे भेजा गया। ये वाकया था एक हॉस्पिटल के एक डॉक्टर का पता नही और कितने वैहशी होंगे जो महिला पेशंट का नाजायज फायदा उठाते होंगे। पुणे का एक किस्सा आपको बताती हूं । पुणे में एक फैशन डिझायनर महिला को उसके मोबईल पर अश्लील SMS आ रहे थे जिसकी शिकायत दर्ज करने के लिए वो पुलिस स्टेशन पहूंची , पुलिस ने उसे हर करह के सवाल पुछे और उससे कहा आप खुद ही पता लगा लिजीए की आपको अश्लील SMS आ रहे है। जब वो महिला अपनी बातों पर कायम रही तो पुलिसवाला अपनी ओछी हरकत पर आमादा हो गया। वो उस महिला से कहने लगा की आप फैशन डिझायनर है, आप ब्लाउज तो सिलाती ही होंगी, मेरा भी नाप लिजीए। पुलिसवाले की बातें सुनकर महिला शर्म के मारे पानी पानी हो गयी लेकीन सारा पुलीस स्टेशन बेशर्मों की तरह दात निकालता रहा । महिला पुलिस कमिश्नर को मिलने के बाद जांच के आदेश दिये गये।जांच रिपोर्ट भी आयी लेकीन कारवाई कुछ नही। वहीं नांदेड जिले में आदर्श नगर का एक वाकया सुनिए एक शिक्षक क्लासेस चलाता था। क्लासेस का नाम था संस्कार क्लासेस चौथी कक्षा से लेकर सातवी कक्षा तक के छात्र छात्राओं को विद्यादान करनेवाला यह शिक्षक छात्राओ के लिए रावण का रूप था। क्लासेस खत्म हो जाने के बाद शिक्षक छात्राओं को बेडरूम में ले जाता था और उन्हे कपडे उतारने को कहता था। उनके नग्न शरीर पर हाथ फेरता था। ये तिनो वाकये एक ही दिन के है, ऐसी कई अनगिणत घटनाओं की शिकार महिला और बच्चीयां बन चुकी है। लैगीक शोषण से हर तबके की महिला पीडीत है चाहे वो पढी लिखी हो या अनपढ..

अंधश्रध्दा का रावण

दो मासूम एक पांच साल का बच्चा और दो साल की बच्ची दोनो शांत लेटे हूएहै। दोनो के बदन पर गुलाल छिडका हुआ है, पास में कुछ फूल और निंबू पडाहै। घर में अष्टमी का हवन हो चुका है, और घरवाले एक साथ एक कोने मेंबैठकर मुंह छिपा रहे है। आप कहेंगें बच्चे लेटे है और परिजन क्यों मुंहछिपा रहे है, तो दरअसल बात ये है की दोनो मासुम मौत की निंद सो चुके हैऔर उनके कातील कॅमेरे से नजर चुरा रहै है।ये घटना मुंबई से सटे ठाणे जिले में स्थित नालासोपारा इलाके की है. यहइलाका कोई ग्रामिण इलाका नही है बल्की उंची उंची इमारते और बडे बडे मॉलसे लबालब इलाका है। दोनो ही बच्चे मृत पडे है इन्हे किसीने अगवा कर मारकर फेका नहीहै बल्की बच्चों की छाती पर खडे होकर उन्हे पैरो तले रौंदा गया है। यहवाकया दुश्मनी के चलती नही बल्की बच्चों के मां बाप चाचा चाची मामा औरदादा-दादी के मौजुदगी में हुआ है। बच्चों की छाती पर खडी हुयी थी बच्चोकी अपनी ही चाची । वो इसलिए खडी हुयी थी ताकी बच्चों के शरीर में कोई अपवित्रआत्मा या भुत पिशाच्च प्रवेश ना कर सके । चाची को साक्षात भगवान ने यहकहा था की बच्चों पर चुडैल का साया हो सकता है और ये चुडैल कोई अन्य नही वल्की बच्चों की दुसरी चाची है। दरअसल भगवान का साक्षात्कार पानेवाली चाची हिमांशु की माने तोउसे कई देवताओं का वरदान है, गणेशोत्सव के दौरान उसके बदन में गणेशजी आतेहै और नवरात्री में मां दुर्गा। अंधश्रध्दा के अंधकार में दो बच्चो कीबली चढ गयी । वहीं पुणे मे भी ऐसे ही एक हादसे को अंजाम दिया गया। भतिजेने चाचा और चचेरे भाई का कत्ल किया गया । आरोपी को यह शक था की उसका चाचाजादूटोणा करते है इसलिए उसके परिवार में परेशानियां बढ रही है। बच्चों का छाती पर पैर रखने की वजह से वह छटपटाने लगे और उनका दमघुटने की वजह से वे बेहोश हो गये। इतना सब होने के बावजूद भी उन्हेडॉक्टर के पास ले जाने के बजाए बाबा को बुलाकर झाड फुंक कराई गयी । लेकीनइस पुरी दुनिया में कौनसा बाबा होगा जो मृत शरीर में प्राण डाले ।अस्पताल पहूंचने से पहले ही बच्चे प्राण त्याग चुके थे।समाज में अंधविश्वास की जडे फैलती जा रही है । एक ओर समाज पढ लिखकर आगे बढने की कोशीश में है वहीं कुछ चंद लोग अंधविश्वास की खाई में गिरकर खुद का ही नुकसान कर रहे है । कौनसा भगवान बदन में आकर किसी की हत्या करवाता है, या बली का भोग मांगता है। किसी पाखंडी बाबाओं द्वारा रची मनघडन कहानियों पर विश्वास रखकर बली देने की परंपरा आज भी जारी है। बली चढाने की होड में महानवमी को बिहार में अफरातफरी की वजह से 15 लोगो की मौत हो गयी। भगवान में आस्था रखना कोई बुरी बात नही, लेकीन भगवान की आड अंधश्रध्दा को बढावा मिलना समाज के लिए काफी घातक साबित हो रहा है।