Monday, November 29, 2010

जारी है सिलसिला

बिजली बिल भरने की कतार में मै खडी थी मेरे आगे एक महिला खडी थी उसने बील जमा करनेवाले से कहा की मुझे इस महिने दूगना बिजली बिल आया है, बावजुद मैने पिछले महीने बिल जमा कर दिया था। उस व्यक्ति ने बिल देखकर कहा की मां जी यह बिल सिर्फ एक महीने का ही है और बिजली के दाम दूगने बढ गये है। वह महिला कहने लगी, कि घर में कमानेवाले कोई नही है कहां से भरेंगें इतना बिल। मेहनत मशक्कत करने के बावजूद खाने पीने के लाले है । एक ओर महंगाई बढती ही जा रही है और दूसरी ओर भ्रष्टाचार थमने का नाम नही ले रहा है। मुंबई में कोलाबा की छह मंजिला इमारत की फाईल सरकारी बाबूओं और मंत्रीयों के हाथो के नीचे से गुजरते गुजरते 31 मंजिला बन गई, और सभी को फाईल मंजुर करने के लिए एक एक प्लैट मिल गया। शहिदो के परिजनो के लिए बननेवाले आशियाने को सरकारी बाबू और मंत्रीजी डकार गये। वहीं देशभर में भ्रष्टाचार का बोलबाला है, दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ खेलो का घोटाला, टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला और वहां दक्षिण में येदीयुरप्पा ने अपने बेटो को खैरात में जमीने बांट दी उसमें हुआ करोडो रूपयों का घोटाला, और अब हालहि में उजागर हूआ होमलोन घोटाला जहां करोडो रूपयो के वारे न्यारे हुए है। होमलोन और कॉरपोरेट लोन पास करवाने के लिए भी रिश्वत करोडे रूपयों ली गयी थी। देश में मानो घोटालो की लहलहाती फसल आ गयी है और चाहे वो अफसर हो या राजनेता हाथो में हसिंया लेकर अपनी अपनी बोरीयां बांध रहे है। वहीं रतन टाटा ने भी उनसे मांगी गयी रिश्वत का जिक्र करते हुए कहा कि वो एविएशन में आना चाहते थे लेकिन उनसे एविएशन मिनिस्ट्री के अधिकारीयों ने पंद्रह करोड रूपये की रिश्वत मांगी थी। घोटाले अब हजारो या लाखों में नही बल्कि करोडो में हो रहे है, और करोडो रूपयों का घोटाला ना हो तो मिडीया उसमे दिलचस्पी ही नही दिखाती। इसी घोटाले के देश में किसानो और मजदूरों के लिए दो- पांच रूपये भी मायने रखते है चवन्नी -अठन्नी जमा करके फसल उगाने वाले किसान ने बे मौसम आयी बरसात के चपेट में अपनी अच्छी खासी फसल को बर्बाद होते हुए अपनी आंखो से देख रहे है। बर्बाद हुए फसल का हर्जाना पाने के लिए उन्हे दर दर की ठोकरे खानी पड रही है। लालफिताशाही के चलते अब तक किसानों की बर्बाद फसलों का मुआयना भी नही हो पाया है , मुआवजा तो सपना लगता है। समाज में दो भाग साफ साफ नजर आ रहे है। एक और घोटाले में लिप्त भ्रष्ट अधिकारी और मंत्री तो दूसरी ओर अपने अधिकार से वंचीत समाज। एक ओर अमीर और अमीर होता जा रहा है,वहीं दूसरी ओर गरीब और भी गरीब । आम इंसान को अपने हक के लिए दर दर की ठोकरे खानी पड रही है, छोटा काम करवाने के लिए भी दफ्तरों में चक्कर लगाते लगाते समय निकल जाता है। घूस ना दे तो महिनो तक बात बनने से रही। सरकार बदले या फिर मंत्री या अधिकारी ही बदल दिए जाए भ्रष्टाचार की जडे इतनी मजबूत हो गयी है की उसे जड से उखाडना असंभव है। चंद लोगो का भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना याने शोर के बीच में अपनी आवाज सुनाना लगता है। भ्रष्टचार न थम सकता है ना इसे बढने से कोई रोक पायेगा। मंत्री या अधिकारी के फेरबदल से उन्हे नसीहत तो जरूर मिलेगी लेकिन वो और भी सजग और चौकन्ने होकर भ्रष्टाचार को अंजाम देगें। जरूरत है सबों को इसके खिलाफ एकजूट होने की। तभी हम एक नये सवेरा की उम्मीद कर सकते है।

Thursday, October 28, 2010

बेदिल मां.....

एक मां ने अपने एक महिने के बेटी को कुडेदान में फेंक दिया और खुद को तिमारदारी से मुक्त कर लिया। यह सारा वाकया सिसिटिव्ही कॅमरे में कैद हो चुका है सारे देश ने भी देख लिया होगा। सात महिने में पैदा हुए दो जुडवा बच्चे एक बेटा और एक बेटी , दोनो को सांस लेने में तकलीफ होने की वजह से उन्हे मुंबई के के.ई.एम अस्पताल में दाखिल करवाया गया। बच्चों की तिमारदारी से और शायद उन्हे हो रही तकलीफ मां से देखी नही जा रही थी। लेकीन एक बेदिल मां ने ही बच्चों को हो रही तकलीफ से निजात देने के लिए उनके मुक्ती का रास्ता ढूंढ लिया। अस्पताल में रात को जब सभी सो गये तब उसने दो जुडवा बच्चो में से बच्ची को लेकर टॉयलेट के खिडकी से बाहर कचरे में फेंक दिया। रात में चुंहों ने उस नवजात को नोंच नोंच के खाना शुरू कर दिया जिसके चलते बच्ची की मौत हो गयी । फिर किसी को खबर ना लगे इसलिए उसने बच्ची चोरी हो जाने का नाटक करके शोर मचाया। लेकीन उसकी चोरी पकडी गयी। लडके और लडकी में से सिर्फ लडकी को चुना गया मारने के लिए। कुल के दीपक को वो मां कैसे मारती जो उनके बूढापे का सहारा बननेवाला था। दो बेटे होते तो वो मां क्या करती। कैसे साहस हुआ होगा उस मां का जिसने बच्ची को खिडकी से बाहर फेका होगा। आज वो मां सलाखो के पिछे है लेकीन उसकी मानसिकता का अंदाजा नही लग पाया है। पुरूष प्रधान संस्कृती में आज भी कन्या की हत्या की जा रही है जिसे परिवार का समर्थन ही मिल रहा है। इस बेदिल मां के भी पिछे उसका परिवार खडा है उनका कहना है की वो सारा किस्सा भुलाना चाहते है और अपने बहू और पोते को वापस लाना चाहते है। स्त्री भ्रुण हत्या का सिलसिला आज भी जारी है। सोनोग्राफी करके पता लगाया जाता है लडका हुआ तो ठिक लेकीन लडकी हुई तो उसका गला पेट में ही घोटा जाता है। लडकीयों की संख्या दिन ब दिन कम होती जा रही है। राजस्थान, गुजरात, यु,पी बिहार में बचपन में ही शादी करवाने का सिलसिला आज भी जारी है। शहर में लडकीयां पढ- लिखकर अपने पैरों पर खडी हो रही है लेकीन देहात में नजारा कुछ और ही होता है। अगर घर में बडी लडकी हो तो चुल्हा – चौका ,भाई- बहनों का संभालने का जिम्मा उन्ही पर होता है, घर के सारे काम काज करनेमें ही सारा वक्त निकल जाता है ना पढाई ना लिखाई। 21 वी सदीं में भी आज नारी को अपने अस्तित्व की लडाई के लिए पुरूषों पर ही निर्भर रहना पड रहा है, चाहे वो पिता हो चाहे भाई या पती। आज एक मां का बेदिल रूप देखने मिला ऐसे अनगिणत मां होंगी जो किसी ना किसी दबाव के चलते अपने बच्चों की बली देने पर मजबूर होती है, लेकीन कन्या की हत्या के पाप में वे बराबर की शरीक है क्योंकी नौ महिने अपनी कोख में बच्चे को रखकर उसको प्यार का स्पर्श देकर पालन पोषण करनवाली मां को पुरा अधिकार है की वो ऐसे दुष्कृत्य को रोके। भगवान को सब जगह रहना नामुमकिन था इसलिए उसने मां बनायी। भगवान का रूप होनेवाली मां बेदिल कैसे बन सकती है।

Wednesday, October 27, 2010

ठाकरे परिवार में महाभारत

कल्याण- डोबींवली महानगर पालिका चुनाव के कुरूक्षेत्र में अब ठाकरे परिवार के बीच जंग की शुरुआत हो चुकी है। महापालिका चुनाव के अखाडे में चाचा और भतीजे ने अपनी तलवार की धार तेज कर दी है। वार- पलटवार का सिलसिला यूं तो कई दिनो से जारी है लेकिन सोमवार को डोंबिवली में हुई सभा में भतीजे ने अपने भाषण में चाचा को खूब खरी खोटी सुनाई उसका बदला लेने में चाचा भी पीछे नहीं रहे, बदले में तीखी और धारदार आलोचना ही कर डाली । राज ठाकरे बनाम बालासाहब ठाकरे शीत युद्ध अब शब्दबेधी वाण का शक्ल ले चुका। पिछले काफी दिनों से थोडा स्थिर था लेकिन अब मुखर हो गया है। दशहरा रैली के दौरान शिवसेना सुप्रीमों ने राज ठाकरे पर निशाना साधते हुए राज को कॉपी कॅट कहा और उनकी नकल उतारकर लोगो को बरगलाने का आरोप भी किया साथ ही यह भी साफ कर दिया की शिवसेना कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उध्दव ठाकरे का चुनाव खुद राज ठाकरे ने ही किया था। ठाकरे परिवार में वंशवाद नही होने का दावा करनेवाले बालासाहब ने अपने पोते को तलवार देकर युवासेना की स्थापना करने के लिए शुभ आशिर्वाद भी दिया। चाचा के नक्शे कदम पर चलनेवाले भतीजे ने यह स्वीकार किया कि उनका लहजा , बोलने का तरीका बालासाहब जैसा ही है क्योंकि बचपन से ही वे बालासाहब के साथ हर सभा में जाते थे, उन्हे सुनते थे। उनके दिए हुए संस्कार को वो आज भी निभा रहे हे। राज ठाकरे ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि चाहे कुछ भी हो जाए बालासाहब उनके लिए पूजनीय थे, है और रहेंगे। लेकिन राज ठाकरे ने बालासाहब को भी कॉपी कॅट होने का आरोप लगाया और कहा कि वो भी मेरे दादाजी की कॉपी करते है। साथ ही यह भी आरोप लगाया की उन्हे शाखाप्रमुख चुनने का अधिकार नही था। बालासाहब ने शब्दों के अनेक अस्त्र चलाकर ठाकरे परिवार में छिडी जंग को स्वीकार किया और राज ठाकरे की सरेआम धज्जियां उडायी। बात तो वही होने लगी जो नाना पाटेकर ने अपने डॉयलग में कहा था,यही वाला साहव ने भी बोला... बच्चा समझ के कंधे पर उठाया तो कान में .........। जिस बच्चे को कंधे पर घुमाया अपने हाथों से खाना खिलाया आज वही हमारे नाम से चिल्ला रहा है। शिवसेना की दुहाई दे रहा है, उसी शिवसेना के बलबुते ये चूहों की सेना चींची करती नजर आ रही है। लातों के भूत जिस तरह बातों से नही मानते उसी तरह मनसे अध्यक्ष का भी समाचार लेना लाजमी हो जाता है। ठाकरी भाषा से हर कोई अवगत है, और उनके इसी लहजे को सुनने के लिए लाखो लोग जुटते हैं, जिसे आम भाषा में मास अपील की संज्ञा देते हैं। लेकिन एक मराठी माणूस चाहे वो शिवसैनिक हो या मनसैनिक हो इस घडी में दुविधा में है। ठाकरे परिवार का पारिवारीक कलह पब्लीक मंच से घर घर तक पहुच चुका है। सत्ताधारी एनसीपी और कांग्रेस नेता भी खूब मजे लेकर परिवार की उडती धज्जियां को गिना रहे है। राजनीति में इस तरह के वाकये होना लाजमी है।लेकिन आशा भंग तब हो रहा है जब मराठी माणूस के अधिकार के लिए लडनेवाले दोनो ही ठाकरे आज आपस में लड रहे है। जिस मराठी माणुष के कल्याण के लिए शिवसेना और मनसे का गठन किया गया था वो आज वंशवाद के मुद्दे पर एक दूसरे की बखिया उघेडने में लगे हैं। लोगों मे आज मजाक का विषय बनते जा रहे है, लोग अब भ्रम में पड चुके है किसका साथ निभाये, किसके साथ जाए। कौन उनकी समस्याएं दूर करेंगा। राजनीति और सत्ता में कोई किसी का नही होता लेकिन आम आदमी के कल्याण का बीडा उठानेवाला ठाकरे परिवार अब अपने अस्त्र एक दूसरे पर नही बल्कि आम आदमी को न्याय दिलाने के लिए उठाये तो बेहतर होगा ताकि जिस उम्मीद से ठाकरे परिवार के साथ लोग जुडे है उनकी उम्मीदों और इच्छाओं पर पानी ना फिर जाए। अंदरूनी राजनीति जानने में आम इंसान को कोई सरोकार नही होता उसे तो चाहिए बस इंसाफ। वो तो कहता है हम क्या जाने नेता कौन कौन हमारा तारणहार हमें बसे दे दो जीने का अधिकार।--

Saturday, October 23, 2010

शिक्षीत दुराचारी

भगवान के बाद ज्यादातर लोग डॉक्टर को तारणहार के रूप में देखते है। जीवन देनेवाला डॉक्टर भगवान की तरह पूजनीय हो जाता है । कई डॉक्टरों ने मरीजों को मौत के मुंह से निकाल लाया है। नवी मुंबई स्थित वाशी का एक डॉक्टर मरीज का तारणहार नही बन पाया इसलिए आज वो सलाखो के पिछे है। लो बीपी की शिकायत होने की वजह से एक महिला को अस्पताल में दाखील कराया गया । दुराचारी डॉक्टर ने उसकी तबीयत नाजुक होने का बहाना बनाकर उसे ICU मे दाखील करने का सुझाव दिया। महिला को सलाईन मे नशे की दवा देकर सुलाया गया। तडके चार बजे जब महिला को होश आया तो डॉक्टर ने चेक-अप करने के बहाने उसे सारे कपडे उतारने कहे फिर उसे नशा का इंजेक्शन देकर उसपर बलात्कार किया। नशे की हालात में वो महिला ना विरोध कर पायी ना ही चिल्ला पायी । महिला का पती ICU के बाहर रातभर बैचेन घुमता रहा । सुबह महिला के बताने के बाद वैहशी डॉक्टर को सलाखो के पिछे भेजा गया। ये वाकया था एक हॉस्पिटल के एक डॉक्टर का पता नही और कितने वैहशी होंगे जो महिला पेशंट का नाजायज फायदा उठाते होंगे। पुणे का एक किस्सा आपको बताती हूं । पुणे में एक फैशन डिझायनर महिला को उसके मोबईल पर अश्लील SMS आ रहे थे जिसकी शिकायत दर्ज करने के लिए वो पुलिस स्टेशन पहूंची , पुलिस ने उसे हर करह के सवाल पुछे और उससे कहा आप खुद ही पता लगा लिजीए की आपको अश्लील SMS आ रहे है। जब वो महिला अपनी बातों पर कायम रही तो पुलिसवाला अपनी ओछी हरकत पर आमादा हो गया। वो उस महिला से कहने लगा की आप फैशन डिझायनर है, आप ब्लाउज तो सिलाती ही होंगी, मेरा भी नाप लिजीए। पुलिसवाले की बातें सुनकर महिला शर्म के मारे पानी पानी हो गयी लेकीन सारा पुलीस स्टेशन बेशर्मों की तरह दात निकालता रहा । महिला पुलिस कमिश्नर को मिलने के बाद जांच के आदेश दिये गये।जांच रिपोर्ट भी आयी लेकीन कारवाई कुछ नही। वहीं नांदेड जिले में आदर्श नगर का एक वाकया सुनिए एक शिक्षक क्लासेस चलाता था। क्लासेस का नाम था संस्कार क्लासेस चौथी कक्षा से लेकर सातवी कक्षा तक के छात्र छात्राओं को विद्यादान करनेवाला यह शिक्षक छात्राओ के लिए रावण का रूप था। क्लासेस खत्म हो जाने के बाद शिक्षक छात्राओं को बेडरूम में ले जाता था और उन्हे कपडे उतारने को कहता था। उनके नग्न शरीर पर हाथ फेरता था। ये तिनो वाकये एक ही दिन के है, ऐसी कई अनगिणत घटनाओं की शिकार महिला और बच्चीयां बन चुकी है। लैगीक शोषण से हर तबके की महिला पीडीत है चाहे वो पढी लिखी हो या अनपढ..

अंधश्रध्दा का रावण

दो मासूम एक पांच साल का बच्चा और दो साल की बच्ची दोनो शांत लेटे हूएहै। दोनो के बदन पर गुलाल छिडका हुआ है, पास में कुछ फूल और निंबू पडाहै। घर में अष्टमी का हवन हो चुका है, और घरवाले एक साथ एक कोने मेंबैठकर मुंह छिपा रहे है। आप कहेंगें बच्चे लेटे है और परिजन क्यों मुंहछिपा रहे है, तो दरअसल बात ये है की दोनो मासुम मौत की निंद सो चुके हैऔर उनके कातील कॅमेरे से नजर चुरा रहै है।ये घटना मुंबई से सटे ठाणे जिले में स्थित नालासोपारा इलाके की है. यहइलाका कोई ग्रामिण इलाका नही है बल्की उंची उंची इमारते और बडे बडे मॉलसे लबालब इलाका है। दोनो ही बच्चे मृत पडे है इन्हे किसीने अगवा कर मारकर फेका नहीहै बल्की बच्चों की छाती पर खडे होकर उन्हे पैरो तले रौंदा गया है। यहवाकया दुश्मनी के चलती नही बल्की बच्चों के मां बाप चाचा चाची मामा औरदादा-दादी के मौजुदगी में हुआ है। बच्चों की छाती पर खडी हुयी थी बच्चोकी अपनी ही चाची । वो इसलिए खडी हुयी थी ताकी बच्चों के शरीर में कोई अपवित्रआत्मा या भुत पिशाच्च प्रवेश ना कर सके । चाची को साक्षात भगवान ने यहकहा था की बच्चों पर चुडैल का साया हो सकता है और ये चुडैल कोई अन्य नही वल्की बच्चों की दुसरी चाची है। दरअसल भगवान का साक्षात्कार पानेवाली चाची हिमांशु की माने तोउसे कई देवताओं का वरदान है, गणेशोत्सव के दौरान उसके बदन में गणेशजी आतेहै और नवरात्री में मां दुर्गा। अंधश्रध्दा के अंधकार में दो बच्चो कीबली चढ गयी । वहीं पुणे मे भी ऐसे ही एक हादसे को अंजाम दिया गया। भतिजेने चाचा और चचेरे भाई का कत्ल किया गया । आरोपी को यह शक था की उसका चाचाजादूटोणा करते है इसलिए उसके परिवार में परेशानियां बढ रही है। बच्चों का छाती पर पैर रखने की वजह से वह छटपटाने लगे और उनका दमघुटने की वजह से वे बेहोश हो गये। इतना सब होने के बावजूद भी उन्हेडॉक्टर के पास ले जाने के बजाए बाबा को बुलाकर झाड फुंक कराई गयी । लेकीनइस पुरी दुनिया में कौनसा बाबा होगा जो मृत शरीर में प्राण डाले ।अस्पताल पहूंचने से पहले ही बच्चे प्राण त्याग चुके थे।समाज में अंधविश्वास की जडे फैलती जा रही है । एक ओर समाज पढ लिखकर आगे बढने की कोशीश में है वहीं कुछ चंद लोग अंधविश्वास की खाई में गिरकर खुद का ही नुकसान कर रहे है । कौनसा भगवान बदन में आकर किसी की हत्या करवाता है, या बली का भोग मांगता है। किसी पाखंडी बाबाओं द्वारा रची मनघडन कहानियों पर विश्वास रखकर बली देने की परंपरा आज भी जारी है। बली चढाने की होड में महानवमी को बिहार में अफरातफरी की वजह से 15 लोगो की मौत हो गयी। भगवान में आस्था रखना कोई बुरी बात नही, लेकीन भगवान की आड अंधश्रध्दा को बढावा मिलना समाज के लिए काफी घातक साबित हो रहा है।

Wednesday, September 8, 2010

करिअर के लिए कुछ भी....

हाल ही में अमरिका ने सर्व्हे में यह पाया की कामकाजी महिला नौकरी में अच्छा औदा और सॅलरी पाने के लिए अपने बॉस को रिझाती है यह सच्चाई उन्होने खुद बयान की है। सभी महिलाएं ऐसा नही करती लेकीन जिन्हे जल्द से जल्द कामयाबी और पैसा पाना होता है उन्हे ये सब कुछ बिल्कूल भी गलत नही लगता। कुछ प्रतिशत महिलाएं अंगप्रदर्शन करके अपने बॉस को आकर्षीत करती है तो कुछ महिलाओं को लगता है की बॉस की नजर में रहेंगी तो उनकी सॅलरी भी बढेगी और वो सारी ऐशो आराम की चिजे जो बॉस को बिना रिझाये नही मिल पायेंगी। ये बात तो है अमरिका में हूए सर्व्हे की जहां अंग प्रदर्शन करनेवाले कपडे परिधान करना आम बात हो गयी है, वहां की संस्कृती रहन सहन सब कुछ अलग है तो जाहीर है की वहा की चकाचौंध में यह बात भी आम हो गयी हो।
मुंबई की चकाचौधं में आकर लडकीयां भी अपने आप को नही रोक पा रही है। । किसी भी तरीके से जल्द से जल्द कामयाबी पाना उनका मकसद बनता जा रहा है, सही गलत का फैसला करना भी वह उचित नही समझ पा रही है, उसके लिए चाहे वो अपना अंगप्रदर्शन करके अपने बॉस या फिर जो उन्हे आगे ले जाए उन्हे रिझाती है। नशा के साथ साथ बिस्तर भी शेअर होने लगता है। यह बात जानकर तो मेरे पैरो तले की जमिन ही खिसक गयी जब बॉलिवुड कव्हरेज करनेवाले एक व्यक्ती ने मुझसे कहा की बॉलिवुड कव्हरेज करने आनेवाली लडकियों के साथ उसने शारीरीक संबध बनाये है और ना उसे कुछ मलाल है ना उन लडकियो को । उन्हे यह सब कुछ जायज लगता है । मुंबई के बाहर से आनेवाली लडकियों को ग्लैमर का बडा ही आकर्षण रहता है, यहां आने के बाद कॉन्टक्ट की कमी खलती है जिसे बढाने के लिए उन्हे किसी का सहारा लेना ही पडता है, सहारा देनेवाला भी मुफ्त में मदत नही करता । खूबसुरत दिखने के लिए पहनावा भी बदल जाता है, कहते है लज्जा नारी का अलंकार होता है लेकीन चकाचौंध के नशे में डूबी लडकीयों को अंगप्रदर्शन करनेवाले पहनावे से हिचकीचाहट नही होती।
बॉलिवुड कव्हरेज करनेवाली लडकीयां अपने ही दोस्तो के साथ बिस्तर और नशा बांट रही है, ताकी अपने असाईंटमेट के लिए अपडेट रहे। यह बात रही बॉलिवुड की, लेकीन आम ऑफिस में नजारा कैसा होता होगा। पुरूषी हौवानियत के कई मामले हमारे सामने है, जहां ऑफिसेस में महिलाओं के साथ छेडखानी हूई है, लेकीन जहां महिला पहल करे तो फिर बॉस के लिए तो सोने पर सुहागा ही होगा। आमतौर पर अब ऑफिसेस में छेडखानी के खिलाफ कानून बना है, जिसे हम जानते हे। लेकिन ऑफिस के बाहर क्या होता है यह बात तो घूमती फिरती पहूंच ही जाती है । भारत में अगर अमरिका की तरह सर्वे किया जाए तो अलग ही सच्चाई सामने आएगी। हमारी पुरूष प्रधान संस्कृती में इस तरह की चर्चा के लिए शायद ही कोई स्त्री पुरूष सामने आये और यह मान्य करे लेकीन आपसी कानाफुसी से बात सभी तक पहूंच ही जाती है।
करिअर बनाना और तरक्की करना कोई गलत नही है लेकीन सिर्फ शारीरीक आकर्षण के जरिए दुसरे का हक मारना बिल्कूल जायज नही जिसका पछतावा समय बितने के बाद ही होगा।

Tuesday, September 7, 2010

उंचाई ले गयी जान....

किशोर कांबले उम्र 20 साल परिवार में इकलौता ऐसा लडका जिसपर सारे परिवार की आशाएं बंधी हुई थी। परिवार को उम्मीद थी की यह लडका हमारे बूढापे की लाठी बनेगा और परिवार का भरणपोषण करेगा। कुछ ही दिन में बेटे को नौकरी मिलेगी तो परिवार के हालात में सुधार आएगा यह उम्मीद लगाये माता – पिता बैठे थे। लडका भी मेहनती था जानता था परिवार की उम्मीदों पर उसे ही खरा उतरना है। बडा भाई अपाहिज, दो छोटे भाई अभी अपनी पढाई पूरी कर रहे है और मां बाप बुढे है। किशोर ने जल्द पैसे कमाने के लिए दहीहंडी फोडनेवाले मंडली में जाकर अपना नाम दर्ज करा दिया। उसने सोचा लाखों की इनामी राशी में से कम से कम उसके हिस्से में दस हजार रूपये तो आएंगे ही। मुंबई और मुंबई से सटे ठाणे इलाके में दहीहंडी के आयोजन का क्रेझ बढता ही जा रहा है। राजनेता दहीहंडीयों का बडे पैमाने पर आयोजन करती नजर आ रही है। दहीहंडी फोडनेवाले मंडलो को लाखों रूपयो के इनाम का लालच देकर उन्हे आकर्षीत किया जा रहा है। उंची से उंची मटकी बांधी गयी जिसतक पहूंचना मुश्कील ही नही बल्की नामुमकीन भी होता है। 10 थरों का मानवीय पिरामीड बनाने की कोशीश में कई मासुम बच्चों को उपर चढाया गया । जानलेवा और खतरनाक खेल में कई गोविंदा गिरते रहे, पिरामीड बनाते रहे। ऐसे ही एक मानवीय थर के चौथे थर में किशोर था। किशोर मानवीय थर बनाने की कोशीश में 3 से 4 बार छाती के बल गिरा। गोविंदा रे गोपाला की जयजयकार, डिजे के शोर में थिरकते गोविंदा के आवाज में किशोर के दर्द की आवाज दब गयी। दुसरे दिन उसकी हालात बिगडी और उसे अस्पताल में दाखिल कराया गया। एक्सरे में पता चला की उसकी छाती में खून जम गया था। किशोर की मौत हो गयी और परिवार में अंधेरा। पिछले तीन चार सालो से नेता दहीहंडी और सार्वजनिक गणेशोत्सव के दौरान अपना शक्तीप्रदर्शन कर रहे है। दहीहांडी का आयोजन किया जाता है जिसमें लाखों के वारे न्यारे हो रहे है और गोविंदाओ की जान से खेला जा रहा है। धार्मीक और पारंपारीक त्योहारों को राजनितीक रंग चढ गया है जिसकी होड में सभी पार्टीयां एक दुसरे से आगे निकलने की कोशीश मे है। सुबह से लेकर रात तक रंगारंग कार्यक्रम , अभिनेता अभिनेत्रीयों की मौजुदगी और डिजे की गुंज में गोविंदा दिनभर खडे रहकर थक जाते है । मानवीय थर लगाने की ताकद भी नही रहती की वो मानवीय थर लगा पाए, नतीजा कई गोविंदा गिरकर जख्मी हो गये है तो कई अपाहिज भी हो चुके है। इस वर्ष गोविंदाओ का बिमा निकाला गया लेकीन उस राशी पर इलाज नही हो पाएगा ना ही अपाहिजता को दूर किया जा पाएगा। किशोर की मोत के बाद उसके परिजनों को एक लाख का मुआवजा मिला लेकीन क्या बेटे की कमी भर पाएगी। क्या इस मौत के खेल पर अंकुश लग पाएगा। दहीहांडी की उंचाइ पर नकेल कसी जाएगी। आयोजको को गोविंदा के जीवन से खेलने से रोका जाएगा। क्या किशोर की मौत के बाद ही सही दहीहांडी का पारंपारीक और धार्मीक रूप बरकरार रहेगा।