Tuesday, December 9, 2008

खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे...

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने की नारायण राणे कि लालसा ने उन्हें पार्टी से बाहर का ही रास्ता दिखा दिया। शिवसेना से बगावत करके कॉंग्रेस में शामिल हुए नारायण राणे नें कांग्रेस भी अपनी अच्छी खासी पैठ बना ली थी, जिसके कारण विलासराव देशमुख सरकार का कच्चा चिट्ठा खोलने वे सोनिया गांधी के दरबार में भी हाजिरी लगा चुके थे। कई बार देशमुख को मुख्यमंत्री पद से हटाने की नाकाम कोशिश भी वे कर चुके थे। मुंह-तोड जवाब देने का दमखम रखनेवाले नारायण राणे ने शिवसेना छोड कॉग्रेस में आने के बाद भी अपना वजूद बरकरार रखा । मुख्यमंत्री पद के दावेदार बनने के लिए उन्होने विधायकों के अच्छे खासे समर्थन भी जुटा लिया था, लेकिन अफसोस वे मुख्यमंत्री की कुर्सी हथियाने में नाकामयाब रहे। आग बबूला नारायण राणे का क्रोध खुलकर सामने आया जिसे देखकर सभी भौचक्के रह गये। नारायण राणे ने न आवं देखा न ताव सीधे सीधे सभी कॉंग्रेस के वरिष्ठ नेताओं पर निशाना साधा। विलासराव देशमुख पर निशाना साधते हुए उन्होने देशमुख को महाराष्ट्र का कलंक तक कह डाला। देश में हुए सबसे बडे आतंकी हमले को रोकने के लिए देशमुख सरकार नकाम रही। ये बात सोलह आने सच है कि ये जिम्मेवारी मौजूदा सरकार की ही थी। अब इसे इंटिलीजेन्स फेल्युअर कहे या सरकार का निकम्मापन जो समय रहते ही ना तो हमले को होने से पहले रोक पायी नाही आतंकियों का मुकाबला करने के लिए पुलिस को आधुनिक सुविधाएं मुहैय्या करा पायी। हमले की जिम्मेवारी लेते हुए जिन्होने अंतरात्मा की आवाज सुनकर इस्तीफा दिया, वो महज लोगों की नजरों में अपनी छवी अच्छी बनाए रखने के लिए था। सत्ता कि लालसा किस तरह इन्सानियत या देश के प्रति फर्ज से बडी होती है, ये नारायण राणे की करतूतों को देखकर सभी को अंदाजा आ गया होगा। मुख्यमंत्री बनने की होड में लगे मंत्रीयों के घर जमावडा लगा था। खान-पान का अच्छा खासा आयोजन किया गया था और इसी दौरान जोड- तोड का तंत्र भी अपनाया जा रहा था। वहीं दूसरी ओर आतंक के खौफनाक चेहरे को याद कर लोग अभी भी सिहर उठते है। देश के विकास के लिए चुने गये मंत्री जी खुद के विकास कि योजना बना रहे थे, महज आठ दिनों में लोगों का दुख-दर्द भुलानेवाले राणे जैसे नेताओं ने देश के लिए शहीद होनेवाले जाबांजो की शहादत पर कालिक पोत दी। पूरा देश जहां शहीदों को श्रध्दांजलि दे रहा है, वहीं कुर्सी के लिए हो रही रस्साकशी बेहद शर्मनाक रही। लेकिन अब इन नेताओं को याद दिलाना होगा कि जिस कुर्सी को लिए वे झगड रहे है उसका अधिकार जनता के पास है। इतने बडे हादसे से कुछ सीख लेकर अगर इन नेताओं की नींद नही टूटेगी तो जनता को खुद ही जगते रहना होगा, और इन नेताओं को कुंभकर्णी नींद से झकझोर कर उठाना होगा।

शब्दों से परे...... नम आँखों से....

सबसे पहले उन २० जाबांज पुलिस अफसर, २ एनएसजी कमांडो और २०० बेकसूर लोगों को श्रद्धांजलि, जो आतंकियो के नापाक इरादों से बच नही पाये। अभी भी कई लोग अस्पताल में अपना इलाज करवा रहे है। ५९ घंटो का वो खौफनाक मंजर मुंबई ही नही बल्कि सारी दुनिया ने महसूस किया। एनएसजी कमांडो मेजर संदीप उन्नीकृषन्न की शहादत की खबर ने दिल को चीर डाला। उनके मृत काया को देखकर एक पल ऐसा लगा की मैं भी फिदायीन बनकर पाक से बदला लूं। एटीएस चीफ हेमंत करकरे, अशोक कामटे और एन्काउंटर स्पेशालिस्ट विजय सालस्कर की खबर सुनकर पैरों तले की जमीन ही खिसक गयी। दिमाग मे कोहराम मच गया। आतंकियों के नापाक मंसूबों को रोकते रोकते १४ पुलिसकर्मी शहीद हुए जिसमें आरपीएफ जवान भी शामिल थे। उन तमाम शहीदों का देश हमेशा कर्जदार रहेगा। देश के लिए मर मिटने का जज्बा सारी दुनिया ने देखा। उनकी शहादत का कर्ज कोई नही चुका पाएगा। सारे देश ने तो उन्हे नम आखों से विदाई दी है, लेकिन उनकी शहादत से सीख लेकर देश के लिए कुछ योगदान करना होगा तभी जाकर वो दिन दूर नही होगा, जब हम सब मिलकर आतंकियों के नापाक इरादों को पैरों तले रौंदकर रख देंगे।

Monday, November 17, 2008

हर फिक्र को धुऍ में उडाता चला गया......

सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक जगहों पर धुम्रपान करने पर पाबंदी तो लगायी है, लेकिन लोगबाग इसपर अमल करते नजर नही आ रहे है। मुंबई महापालिका ने भी आनन फानन में धुम्रपान करनेवालों को दंडित करने का निर्णय तो लिया लेकिन वो महज कागजों पर ही है। कंपनीयों में लंच टाईम के बाद कर्मचारी कश पे कश लगाकर अपने फिक्र को धुऍं में उडाते नजर आते है। सैंकडो का जत्था धुम्रपान में मशगूल नजर आता है। पान के ठेलों पर भी नजारा कुछ अलग नही होता। हालाकि धुम्रपान करनेवालों के लिए होटलों में व्यवस्था कराई गयी है। लेकिन मेरी नजर में अगर सरकार ने ही सार्वजनिक जगहों पर धुम्रपान करने पर पाबंदी लगायी है, तो क्यों न इसी का फायदा उठाते हुए सिगरेट पीना बंद करे। ताकि फेफडों को खराब होने से बचाया जाय, और सिगरेट पर होनेवाले खर्च को भी टाला जा सकता है। समय रहते ही अगर स्वास्थ के प्रति ध्यान दे तो खुद के साथ साथ परिवारवाले भी स्वस्थ और निश्चिन्त रह पायेंगें । अगर धुम्रपान पुरी तरह छोड नही सकते, लेकिन कोशिश करना आपके ही हाथ में है। सिगरेट के पॅकेट पर लिखी चेतावनी को अनदेखा मत किजीए। प्रशासन ने पहल की है उन्हे साथ दिजीए। आपके स्वास्थ और परिवार की खुशहाली आपके ही हाथ मे है।

Wednesday, November 5, 2008

रक्षक ही बने भक्षक

रक्षक बने भक्षक : मालेगावं ब्लास्ट के साजीश की परते खुलती गयी , और अचानक से एक धक्का लगा जब ब्लास्ट को अंजाम देनेवालों के नामों में कुछ आर्मी ऑफिसर के नाम सामने आये। देश की रक्षा करनेवाले जब आंतकीयों के साथ शामिल हो जाए तो आम हो या खास सभी की जान खतरें में नजर आ रही है। बदले की आग में मालेगाव ब्लास्ट को अंजाम दिया गया है, तो अंजाम देनेवालों को आतंकी कहा जाए तो कोई गलत बात नही होगी। आर्मी अफसरों का इस कदर ब्लास्ट की साजीश में शामील होना, आतंकीयों को ट्रेनिंग देना देश के साथ गद्दारी है। अपने जमीर को गिरवी रख कर चंद रूपयों के लिए देशकी सुरक्षा के साथ ये खिलवाड कर रहे है। ब्लास्ट में मारे गये लोग हमारे ही समाज का एक हिस्सा है, जिसे हम नकार नही सकते। लेकीन नफरत की आग हो या पैसे की लालच देश को तोडकर बर्बाद करने का काम कर रही है। जीन आर्मी जवानों पर देशवासीयों को गर्व होता है, जीनके किस्से सुनकर सीना गर्व से फुल जाता है, उनके नाम पर कलंक लगाने काम इन गद्दारों ने किया है। जहां बोरवेल में गीरे छोटे से बच्चे को बचाने के लिए दिन रात एक करके जवान अपनी जाबांजी की मिसाल देते है, सीमा पर इन्ही के बुते हम आराम से अपने घरों में चौन की निंद सोते है, वहीं कुछ अफसरों ने अपने टॅलेन्ट की धज्जीयां उडा दी। सालों से बनायी इनकी प्रतिष्ठा अब खाक में मील चुकी है। आर्मी के दामन को इन्होने दागदार कर दिया है। रक्षक ही जब भक्षक बने तो भगवान भरोसे ही अपने आप को रखना होगा। फिरभी उम्मीद है की वक्त रहते ही और लोग भी संभल जाए। कानून अंधा जरूर है लेकीन उसके हाथ लंबे है , देर से ही सही लेकीन दोषी कानून की गिरफ्त से बच नही सकेंगे ।

Sunday, November 2, 2008

क्षेत्रवाद राष्ट्रीय एकता पर हावी

मराठी बिहारी के बीच चल रहे विवाद की अग्नी में अब लालू प्रसाद यादव और घी डालने का काम कर रहे है। बिहारी सासंदों को पंधरा दिन के भीतर इस्तीफा देने का फरमान उन्होने दिया है। बिहार में सासंदो पर दबाव डालकर महाराष्ट्र में रहनेवाले आम उत्तर भारतीयों की परेशानीया क्या कम हो सकती है आप लडीये हम कपडा संभालते है, कहकर आम आदमी को उकसाकर लडने के लिए तैय्यार करना क्या जायज है। छठ पूजा जैसे आस्था के पर्व को राजनीतीक रूप देकर अपनी ताकद दिखाने की कोशीश ही लोगों के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही है। वहां मनसे अध्यक्ष को मारने के लिए कुछ लोग शहर में आए है ऐसी गलत खबरों को हवा देकर मराठी लोगों की सहानुभुती इकठ्ठा करने का काम खुद मनसे कार्यकर्ताओं ने ही किया है। राजनीतीक स्वार्थ के लिए आम आदमी को ही इस्तेमाल किया जा रहा है। आम आदमी को ये क्यां नही समझ आ रहा है की लडकर नही बल्की आपसी प्यार और सुझबुझ के साथ ही मुंबई या महाराष्ट्र ही नही बल्की सारे देश की तरक्की होगी। नेताओं की राजनीती को समझना अंब आपके हाथ में है। बस बहोत हो चुका ये अब खुनी खेल ।आपसी टकराव से किसी का हित साध्य नही हो पाएगा । कोई भी जाती, धर्म, भाषा के लोगों को कहीं भी जाने का रहने का अधिकार है, उनके अधिकारों को छिनना या उनपर हमला करना निदंनीय है। नेताओं ने आपसी रंजीश खत्म करके जनता के भले के लिए, बेरोजगारों के लिए कुछ ठोस करने की जरूरत है तभी जाकर नेता नेता कहलाएंगे वर्ना लोगों की गालीयां और हाय आए दिन लगती रहेगी।

Friday, October 3, 2008

विस्फोटों का यह मंजर

लगातार हो रहे विस्फोटों से देश का हर नागरिक सहमा हुआ है, पता नही अब अपनी बारी कब होगी यह सोचकर सहम गया है। पता नही कहां कब, कैसे हम भी किसी आतंकीयों का शिकार बन जाए। दिन ब दिन हो रही आंतकी वारदातों से आम जनता में खौफ का माहौल है। जो दिन गुजर गया वो अपना है। सतर्कता से सभी आसपास हो रही गतीविधीयों पर नजर बनाए रखें है, लेकिन जीत रहे है आतंकी। मकडी की तरह जाल बुनकर मासूम लोगों को अपनी जाल में फसांते ही जा रहे है। आतंकीयों के मददगार ये क्यों नही समझ रहे है, कि जेहाद के नाम पर उन्होने कितने घरों को तबाह किया है, । तबाही का मंजर देखकर खून खौलने लगता है, जी तो करता है आतंकी पकडे जाने पर उन्हे भरे चौक में खडा करके गोलियों से भूना जाए। उन गद्दारों के साथ भी यही बर्ताव किया जाय जो अपने ही देश के लोगों की जान छिन चुके है, चाहे वो किसी भी के हो ईश्वर के नाम से लोगों को बरगलानेवालों के नापाक इरादों को कुचलने के लिए हमें सतर्क नही बल्की चौकन्ना रहना होगा। अपने कोष में से बाहर निकलकर दुनियादारी की भी खबर रखनी होगी। सिलसिलेवार हो रहे बमविस्फोटों को रोकने के लिए सरकार प्रयास तो कर रही है, लेकिन आतंकी हर बार कामयाब हो रहे है। हायटेक आतंकीयों को मदद करनेवाले पढे लिखे लोगों से ये गुजारिश है, कि जिस थाली में खा रहे हो उस थाली में छेद ना करे। अपने देशवासीयों को धर्म के नाम पर ना बाटें । जमीन के लोग कुछ ना कर पाये लेकिन जिस किसी भगवान में वो यकीन रखते हो, वो हिसाब जरूरू मांगेगा।

Thursday, October 2, 2008

पंक्षी के दिल का दर्द

एक सरकारी कार्यालय के बाहर एक पेड है। उस पेड पर एक कौआ लगातार दो तीन दिनो से आकर दिनभर कायं कायं करता रहा। चौकीदार कौए की कायं कायं से दिनभर परेशान था। हर दिन उस कौए को भगा देता था। कौआ फिर चौथे दिन उसी पेड पर बैठकर कायं कायं करने लगा। चौकीदार ने सोचा की अब एक नजर पेड के उपर देख ही लेते है। पेड की तरफ देखा तो पेड पर एक मादा कौआ का पैर पतंग की मांजा में फंसा था। तीन दिनो से वो पेड पर लटकी हुयी थी। चोकीदार ने झठ से दमकल विभाग को बुलाकर उस मादा कौए को राहत पहूंचायी। अपने साथी पंछी को छुडवाने की कोशीश करनेवाला कौआ सफल हो गया। जानवर और इंसानो में श्रेष्ठ कहे जानेवाला इन्सान लोगों की मदत करने से हिचकिचा रहा है। खुद की बात करे तो किसी भी चिज को पाने में वो अगर असफल होता है तो, आगे प्रयास करना छोड देता है। चिटीयां भी जब अपना पेट भरने के लिए कतार में अनाज की खोज में निकलती है, हम इन्सान अगर जाती और धर्म भेद मिटाकर एक साथ रहे तो हमारा देश सचमुच सारे जहां से अच्छा होगा। तो सफलता पाने के लिए जरूर कोशीश करे, क्योंकी कोशिश करनेवालों की हार नही होती.