Wednesday, January 20, 2010

अब की बारी दूध.....

केंद्रीय कृषी मंत्री श्री शरद पवार का एक और बयान, जो मुनाफाखोरो के लिए वरदान साबित होगा। पहले चावल, फिर दाल बाद में गाज गिरी चीनी पर अबकी बारी है दुध की । शरद पवार जी का बयान है की भविष्य में दूध की किल्लत होगी याने दूध महंगा होगा । धिरे धिरे आम आदमी के मुंह से बचा कुचा निवाला भी छिने जाने की तैय्यारी। एनसीपी नेता तारीक अन्वर कह रहे है की शरद पवार एक जिम्मेदार व्यक्ती है और किसी भी चिज की किल्लत होगी तो वो चिज महंगी तो होनी ही है। भारत दूध उत्पादन में नंबर एक पर है, वावजूद इसके लोगों को एक लिटर दूध के लिए 40 रूपये देने पडते है। अभी यह हाल है तो शरद पवार के बयान के बाद दूध के दाम आसमान छुने लगेंगे। बच्चों के मुंह से दूध की प्याली छिन जाएगी। चलिए हम विश्वास रखते है की भले ही कृषीमंत्रीजी की यह बिल्कूल भी मंशा नही होगी की जरूरी चिजों के दाम बढे लेकीन उनके बयान आम आदमी की कमर तोड रहा है। चिनी के दाम बढने से चाय की मिठास पहले से ही कम हूई थी अब रंग भी फिका हो जाएगा। वैसे भी गरीब आदमी चाय पीकर अपनी भुख को दबा रहा है। मंहगाई के मुद्दे पर तो मायावतीजी ने श्री शरद पवार को मंत्रीमंडल से हटाने तक की मांग कर डाली । दुसरे दिन पवार साहब अपने बयान से मुकरे जरूर है लेकीन महाराष्ट्र में इसका असर जरूर हो गया है। गोकुल दूध के दाम प्रती लिटर २ रूपयोंसे जरूर बढे है। आमदनी अठ्ठनी और खर्चा दो रूपया हो गया है। मंत्रीजी से यह बिनती है की आप भविष्यवाणी करके आम आदमी के मुह का निवाला तो मत छिनीए।

Tuesday, January 12, 2010

मंत्रीजी मांगे मोर.....

बढती महंगाई ने आम आदमी की पहले से ही कमर तोड दी है। राशन का खर्चा, घर का किराया, बच्चो की फीस का खर्चा निकालकर कुछ सेव्हींग करना मुश्कील बात है फिर भी मुंबई में बसेरा हो यह सबकी चाहत होती है । आम आदमी का मुंबई में घर खरीदने का सपना महज सपना ही रह गया है। घर का सपना आम मुंबईकरों को शहर से दूर ले गया है। आमदनी अठ्ठनी और खर्चा रूपय्या ऐसी हालात में गुजर बसर करना लाजमी हो गया। मंहगाई की मार ने तो दो वक्त के खाने में कजुंसी करने पर मजबूर कर दिया है। लेकिन महाराष्ट्र सरकार करोडो रूपयों के वारे न्यारे कर रही है, वो भी जनता के पैसो पर। महाराष्ट्र सरकारने मंत्रीयों के केबीन को नया लूक देने का काम शुरू कर दिया है। एक एक केबीन के रिनोवेशन का खर्च है 10 लाख से लेकर 25 लाख रूपये। एक केबीन के खर्च में एक परिवार अपना घरौंदा बना सकता है। एक और जहां सरकार करोडो रूपयों के कर्ज तले दबी है, वहीं दुसरी और लोगों का पैसा पानी के तरह बहाया जा रहा है। मंत्रालय को अब कॉर्पोरेट लूक चाहिए। एसी केबीन में बैठकर किसानो और पीडीतों का दुख दर्द सुना जाएगा। किसानों की फसल की नुकसान की चर्चा अब मंहगी केबीन में बैठकर की जाएगी। मुंबई महाराष्ट्र की जनता महंगाई, बेमोसमी बारीश, बेरोजगारी से त्रस्त है, वहीं सरकार करोडो रूपये खर्च करने में मस्त है। केंद्रीय कृषीमंत्री ने ये कहकर अपना पल्ला झाड लिया की चीनी के दाम कब कम होगें यह कहने के लिए मै कोई ज्योतिषी नही हू। कृषीमंत्री का यह बयान मुनाफाखोरों की जेबे भर रहा है। मुनाफाखोर तो बस इसी ताक में है की कब सरकार यह ऐलान करे की महंगाई पर काबू नही पाया जा रहा है और कब वे अपने गोदाम में रखे माल को दुगने तिगुने दाम में बेचकर मालामाल हो जाए। कृषीमंत्रीजी को ज्योतिषी नही बनना है तो ना सही लेकिन कम से कम एक अच्छा मंत्री बनकर लोगों के दुख को दूर नही लेकिन कम तो जरूर कर सकते है। आतंकी हमले से निपटने के लिए मुंबई पुलिस को आधुनिक हथियारों से लैस करने करने की कवायद तो हो रही है, लेकिन अभीभी नक्षल प्रभावित क्षेत्र में पुलिस को अपनी जान की बाजी लगाकर शहिद होना पड रहा है। उनके पास ना तो आधुनिक हथियार है नाही जंगल का मुआयना करने के लिए हेलीकॉप्टर। मंत्रीयों में जरासी भी संजीदगी बची हो तो पुलिस बल को सक्षम करे, महंगाई कम करने के लिए ठोस उपाय ढूंढे । अलिशान केबिन में बैठकर मगरमच्छ के आसुं मत बहाईये।

Tuesday, January 5, 2010

बच्चे का दोस्त बनिए

नये साल का चौथा दिन कईयों ने नये साल के लिए अलग –अलग प्लान बनाये होंगे, कईयों ने नया कुछ करने का संकल्प किया होगा। मुंबई ने नये साल का स्वागत जोशो खरोश में किया । आतंकीयों के हमले में पिछले साल सहमी मुंबई नये साल में फिर एक बार नये सिरे से पुरी ताकद के साथ खडी हूई। लेकिन नये साल की खुशियों में सराबोर मुंबई पर सोमवार को जैसा मातमसा छा गया । दिन एक घटनाएं तीन मुंबई में अलग अलग तीन जगहों पर दो छात्राएं और एक छात्र ने आत्महत्या की। तीनो छात्रों ने एक ही तरीका अपनाया फांसी का फंदा। मुंबई से सटे डोंबिवली में छठी कक्षा में पढनेवाली नेहा ने मौत को गले लगाया। नेहा पढने में तो होशियार थी साथ ही नृत्य में भी निपूण। नृत्य के लिए उसे कई अवार्ड भी मिल चुके है। नेहा का पढाई में ध्यान लगने के लिए उसका डान्स क्लास बंद कराया गया। बस यही कारण था नेहा ने घर में फांसी ले ली। नेहा उसका डान्स बंद नही करना चाहती थी, यह सदमा वो सह नही पायी और उसने मौत को गले लगाना पसंद किया। दूसरा वाकया दादर के शारदाश्रम स्कूल का है। सातवी कक्षा में पढनेवाले सुशांत ने स्कूल के टॉयलेट में फांसी लगाकर आत्महत्या की। सेकंड सेमिस्टर में सुशांत चार सब्जेक्ट में फेल हो गया । वहीं तीसरी आत्महत्या की है पवई में रहनेवाले भजनप्रीत कौर ने। एमबीबीएस के पहली वर्ष की छात्रा भजनप्रीत के परिक्षा में कम नंबर आये थे। एक दिन में घटी तिनों घटनाओं को देखकर मुंबई दहल गयी। अभिभावक दहशत में है। प्राथमिक अनुमान निकाला जाए तो छात्रों की आत्महत्या के पिछे का कारण है पढाई का बोझ, और परिवारवालों की बढती अपेक्षा। अभिभावकों को लगता है की अपना बच्चा पढाई में अव्वल हो, समाज में उसे उचीत सम्मान मिले। लेकिन वो भूल जाते है की उनके बच्चा रेस में दौडनेवाला घोडा नही है। बच्चों पर पढाई का बोझ लादना सरासर गलत तो है ही लेकिन बच्चों के साथ संवाद का अभाव भी एक कारण है। बच्चों के उज्वल भविष्य के लिए माता- पिता दोनो को नौकरी करना अनिवार्य हो गया है। अभिभावक पैसा कमाकर बच्चों की जरूरतों को पुरा कर रहे है, लेकिन इस व्यस्तता में वे भूल रहे है की बच्चों से बैठकर बात करना उनकी मानसिकता समझना बेहद जरूरी है। बच्चों की कमजोरी पर उन्हे डांटकर नही बल्की उनकी परेशानियों का हल निकालना जरूरी है। साथ ही टिचर्स ने भी बच्चों की कमजोरीयों को भांपना जरूरी है। बच्चों में हो रहे बदलाव पर नजर रखकर उसे उचीत समय पर डॉक्टर को दिखाना होगा। बच्चों के दोस्त बनिए, अपनी इच्छा के बोझतले उन्हे मत दबाईये। उनके अंदर छुपे गुणों को बढावा दिजीए। आपका बच्चा सही मायने में मानसिक और शारीरीक रूप से स्वस्थ रहेगा और कामयाबी को चुमेगा।

Monday, January 4, 2010

करियर का विनाश- रैगिंग

मुझे आज भी याद है कॉलेज को वो दिन, एडमिशन लेते वक्त काफी खुशी थी, कैसा होगा कॉलेज, स्टुडेन्टस कैसे होगे, टिचर्स कैसे पढाएंगे इस बात का एक्साईटमेंट था। लेकिन जब कॉलेज का पहला दिन आया तो कॉलेज जाने से डर लगने लगा। डर पढाई का नही था बल्कि रैगिंग का नाम सुन रखा था। कुछ साल पहले भी कॉलेज में रैगिंग का चलन था, लेकिन आज जिस तरह वहशियाना है उस तरह का नजारा पहले नही था। कॉलेज में सिनीअर्स ज्युनियर्स का मजाक उडाते थे, वह मजाक केवल मजाक तक ही सीमित रहता था। बाद में सिनिअर्स ज्युनिअर्स को अपने नोटस देकर उन्हे पढाई करने का तरीका भी सिखाते थे। लेकिन आज का दौर काफी आगे निकल गया है। नयी नयी तकनीक से लैस छात्रों को छेडछाड के नये नये तरीके आसानी से मिल रहे है। आज पढने पढाने का तरीका, रहन सहन का तरीका बिल्कुल बदल चुका है। छात्रों से बदसलूकी करना, लडकियों से छेडछाड करना आम बात हो गयी है। रैगिंग का विभत्स रूप सामने आ रहा है। अश्लीलता ने अपने हाथ पांव पसारे है। और अश्लीलता का शिकार बन रहे है मासूम छात्र। पैसा और तकनीक को इन्सानियत से ज्यादा जगह मिल रही है। रैगिंग के शिकार सैकडों बच्चो ने आत्महत्या करके मौत को गले लगा लिया वहीं कई बच्चों की मानसिक हालात ठीक नही है, उनकी जिंदगी पुरी तरह से बर्बाद हो गयी है। सुप्रीम कोर्ट ने रैगिंग के खिलाफ ठोस कदम उठाने के निर्देश भी दिए है बाबजूद ऐसी घटनाओं में कमी नही आ रही है। रैगिंग के खिलाफ कानूनी कारवाई तो हो रही है, लेकिन जो छात्र उसका शिकार हो रहे है उनकी जिंदगी का खामियाजा कोन देगा। फिल्में देखकर उसमें दिखायी गयी निगेटिव बातों को अमल में लाना सरासर बेवकूफी है। फिल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए देखें ना ही उसका दुरूपयोग करने के लिए। ज्युनिअर्स से मजाक मस्ती जरूर करें लेकिन सिनिअर्स होने के नाते उनकी रक्षा करना आपकी जिम्मेदारी बनती है। संस्कार सफलता की कुंजी है, उसे खो देने से जीवन पार तो हो जाता है लेकिन सफल नही होता। छात्र भी यह जान ले की अन्य छात्रों को मारपीट करके या उनसे अश्लील हरकते करवाकर उनका तो कुछ फायदा नही होगा बल्कि खुद उनका ही करियर बर्बाद होगा। विद्या के मंदीर को कलंकित करने से मंदीर पर काला धब्बा तो लग ही जाता है लेकिन दुष्कर्म करनेवाले को सजा भी जरूर मिलेगी। के. ई.एम के 18 छात्रों के खिलाफ पुलिस केस बन चुका है, उन्हे पढने की इजाजत तो दी गयी है, लेकिन उन्हे हॉस्टल से धक्का मारकर निकाला गया । पढाई के लिए मिलनेवाला पैसा भी हाथ से निकल गया साथ ही अब वो किसी भी कॉम्पीटिशन में हिस्सा नही ले पायेंगे। इस सब घटनाओं मे उन मां बाप का क्या कसूर जिन्होने अपना पेट काटकर, कर्ज लेकर मेडिकल में अपने बच्चे का दाखिला करवाया है, वो कहां से लाये पढाई के लिए ढेर सारा पैसा। रैगिंग करना आसान है, लेकिन उसका खामियाजा भुगतना दर्दनाक है। कॉलेज लाईफ जरूर एन्जॉय किजीए लेकिन गलत इरादों को फलने फूलने ना दें।

Thursday, December 24, 2009

बूझ गया चिराग.. डूब गया घर का सूरज ...

कक्षा पांचवी का छात्र चिराग पटेल स्कूल प्रशासन की लापरवाही की बलि चढ़ गया। स्कूलों में चलन हो गया है एडुकेशनल टूर और पिकनिक मनाने का। चिराग के स्कूल वालों ने भी पूरे स्कूल का पिकनिक मनाने पुणे के वॉटरपार्क में ले गये थे। सुबह सात बजे नवी मुंबई से गये पिकनिक मनाने वाले सारे बच्चे रात को दस- ग्यारह तक मुंबई लौट आए लेकिन उन बच्चों में चिराग नही था। लौटते वक्त बच्चों का गिनती की गयी जिसमें चिराग नही था। बच्चों से यह कहा गया की चिराग बाद में आ जाएगा और चिराग को छोडकर सभी बच्चों को वापस लाया गया। बच्चों के साथ गये टीचर्स ने उसके माता –पिता को इत्तला देने की जहमत भी नही उठायी। पांच छ घटों तक चिराग के परिजनों से यह बात छुपाई गयी। सुबह पता चला की स्विमींगपुल में तैरने के लिए चिराग पानी में तो उतरा लेकिन बाहर आया। बाहर निकला तो चिराग का मृत शरीर जिसमें कभी बचपन हँसता था अब वो बेजान हो चुका था। हालांकि सभी को यह पता था कि चिराग तैरना नही जानता। इस बात की जानकारी होने बावजूद भी टीचर्स ने उसे रोका नही। इसका दोष तो सीधे उन लोगों पर जाता है जो बच्चों को तो पिकनिक मामने को ले जाते हैं, लेकिन उनके नाम पर और उन्हीं के माता पिता के जरिये चुकाए पैसे से अपने मौज मस्ती में मशगूल हो जाते हैं, तो वैसे लोगों को चिराग का घ्यान ही कहाँ रहेगा। उनकी शर्म तब भी नहीं आयी जब लापाता होने का बात जान कर छुपाई और ना ही चिराग के माता पिता से इस बात की चर्चा ही की। ना ही मासूम चिराग को ढूँढने की कोशिश की गयी। पिछले कुछ दिनों से प्राइवेट स्कूलों की लापरवाही के कई मामले सामने आये है। बसों में बच्चों को तो ठूँसने का मामला हमेशा ही देखने को मिलता है । हाल ही में नवी मुंबई में स्कूल बस में आग लगने से छह बच्चे झुलस गये थे। उसी नवी मुंबई में ही दो स्कूली बस आपस में टकराई थी। शुक्र है इस हादसे में बच्चों को कोई नुकसान नही पहूंचा। कल की ही बात है उल्हासनगर में नौवीं क्लास में पढनेवाले छात्र को स्कूल में पहूंचने में थोडीसी देरी हो गयी, जिसे सहमा बच्चा मारे डर के पिछले गेट से स्कूल के अंदर जाने की कोशिश की और इसी कोशिश में लोहे का सरीया उसके हाथ में घुस गया। दो घटें तक बच्चा लहु-लुहान होकर गेट से लटका रहा। लेकिन स्कूल से कोई मदद के लिए उस बेबस के पास नहीं पहुँचा असहाय और सहमा मासूम झूलता रहा और सनता रहा अपने ही खून में। आखिरकार आसपास के लोगों ने गैस कटर के सहारे सरीया काटकर बच्चे को अलग किया। बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, अच्छे संस्कार मिले इसी उम्मीद पर अपना पेट काटकर कई मां बाप बच्चों के स्कूलों का खर्चा उठाते है। बडे बडे स्कूलों में डोनेशन के नाम पर ऐठने वाली मोटी रकम चुका कर दाखिला करवाते है। लेकिन स्कूल है कि केवल रकम इकट्टी करने की मशीन बन गए हैं। टीचर हैं कि संस्कार देना और हिफाज़त करना तो दूर अपने ही विद्या मंदिर और गरिमा को कलंकित कर रहे हैं। बहुत पहले ही कहा गया है कि गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देव महेश्वर:, गुरूर साक्षात परब्रह्म तस्मैव श्री गुरुवे नम:। छात्र तो इस पर अमल कर लेगें लेकिन लेकिन अब वो गुरु कहाँ से लाएँगे चिराग को जो बुझ चुका है.... क्या गुरु अपने पद से गिर नहीं गये। इन पदच्यूत गुरुओं के साथ व्यवहार क्या होना चाहिए ये तो आप ही तय करेंगे।

निर्दयी प्यार......

दो दिन , और दो घटनाएं जीने मरने की कस्में खाना , हर सुख दु:ख में साथ निभाने का वायदे हर प्रेमी- प्रेमिका करते है। प्रेमी की एक झलक पाते ही भूख प्यास सब कुछ मिट जाती है। प्यार करनेवालों की अपनी एक अलग ही दुनिया होती है। किसी की भी परवाह नही, कभी कभी तो समाज से बगावत करने में भी ये हिचकिचाते नही, अपने ही दुनिया में मस्त रहते है, हमेशा ही एक घरौदा बिनते रहते हैं। प्यार में सराबोर प्रेमियों को हर तरफ प्यार ही प्यार नजर आता है। लेकिन यह प्यार जब विश्वासघात में बदल जाए तो रूंह काप उठती है। सात जन्मों तक साथ निभाने की कस्में खाकर अग्नि के सात फेरे लेनेवाले दो प्रेमियों ने पति बनने के बाद छह महीने के भीतर ही अपना राक्षसी रूप दिखा दिया। अपनी पत्नि को घूमने ले जाने के बहाने उन्हे पहाडियों से धकेलकर उन्हे जान से मारने की कोशिश की। हालांकि दोनो पति अपने गंदे मनसूबे में नाकाम रहे। पहली घटना है महाराष्ट्र के पुणे की जहां 20 दिसंबर को पति ने अपने पत्नी को गहरे पानी में धक्का दे दिया। दूसरी घटना है, महाराष्ट्र के महाबलेश्वर की जहां 21 दिसंबर को पति अपनी पत्नि को लेकर पहाडियों के खूबसूरती का नजारा दिखाने ले गया। पति ने अपने राक्षसी रुप दिखाते हुए पत्नी का गला दबाया, जिसके चलते वो बेहोश हो गयी। पत्नी को मरा समझकर उसे उंचाईयों से धक्का दिया। होश आने पर अंधेरे में जंगल और झाडियों से 8 किलोमीटर का रास्ता उस असहाय महिला ने तय किया। रात में गावंवालो से पनाह ली, और अपने माता पिता से संपर्क साधा। पत्नी को धक्का देकर पति तो फरार हो गया लेकिन कानून के लंबे हाथ से बचकर जाता कहां। दोनो बेवफा पति, पत्नियों के शिकायत के बाद सजा काट रहे है। उन्हे कडी से कडी सजा मिलनी चाहिए ताकि इस वाकये को कोई और दोहरा ना सके। प्यार के झांसे में आकर आजतक कई लडकियां बर्बाद हो चुकी है, उसमें से कई एकतरफा प्यार की शिकार हुई हैं। लडकियां, महिलाएं आए दिन पुरूषों के अत्याचार की शिकार बन चुकी है। नाबालिग लडकियों पर बलात्कार के कई मामले सामने आये है, चाहे वो शहर हो या फिर गांव। नारी शहरी हो या ग्रामीण हवस का शिकार बन ही जाती है। महाराष्ट्र के भंडारा जिलें में नयी नवेली दुल्हन को अपने जीवन की पहली रात ससुर के साथ बितानी पडती है, .यह वहां का रिवाज है। कोई भी लडकी इस बात के लिए कतई –तैयार नही होगी। सिक्के का दूसरा पहलू भी है। कई ऐसे परिवार है जिन्होने प्यार का साथ दिया है। कईयों ने प्यार के लिए मौत को भी गले लगा लिया। यह सच है की आए दिन महिलाओं पर हो रहे अत्याचार का ग्राफ बढता ही जा रहा है। अगर पति- पत्नि में अनबन हो या परिवार में खटास हो तो मामले को मिल –बैठकर सुलझाया जा सकता है या फिर ना सुलझे तो अलग होकर अपनी अपनी जिंदगी खुशी से बिताये। किसी को जिंदगी नही दे सकते तो उसे छीनने का भी किसी को कोई अधिकार नही। कहते है प्यार बांटने से बढता है, लेकिन इन सब घटनाओं को देखकर प्यार के नाम से डर लगने लगा है। आज की महिला और पुरूष दोनो सजग है लेकिन कहते है ना की प्यार अंधा होता है, सजगता की आखों पर भी पट्टी बंध जाती है। समाज, और परिवार में कटुता आ ही जाती है। प्यार किया नही जाता, हो जाता है, दिल दिया नही जाता खो जाता है। यह बात सोलह आने सच तो है लेकिन अगर किसी से प्यार हो जाए तो उसे इमानदारी से निभाये। अंतर आत्मा की आवाज सुने। धोखा देना बडा आसान होता है, लेकिन घोखा देनेवाला सबसे बडा भिखारी होता है...प्यार सिर्फ जीवन में एक बार ही होता है। क्योकि कसमें तो उसने भी खायी ही होगी और जीवन भर वो उस प्यार की तलाशने करता रहेगा ......

Monday, December 21, 2009

भगवान अब तो मौत दे दो....

अरूणा शानबाग.... 61 वर्षीय महिला.. जो पहले सबों का ख्याल रखने में कोई कसर नहीं छोडती थी। आज ना ही देख सकती है, न सुन सकती है और ना ही महसूस कर सकती है। कौन अपना कौन पराया उसे कुछ भी पता नही। आज अरूणा जिंदा लाश में बदल गयी है जो दवाईयों की बैसाखियों के सहारे जीवन व्यतीत करने पर मजबूर है। हां उसे मजबूर ही कहेंगे क्योकि पिछले 36 साल से वो कोमा में है, हाथ-पैर टेढे हो चुके है, दिमाग बंद है, संवेदनाएँ कुछ भी नही। कौन खाना खिला रहा है, कौन उसे स्नान करा रहा है ,किसी बात का उसे इल्म नही। 36 साल पहले अरूणा हैवानियत की शिकार हुई। शिकार भी ऐसे की सीधे वो कोमा में चली गयी। अरुणा को हैवानियत का शिकार बनाया उसी अस्पताल के कर्मचारी ने । उसने अरूणा को मरने के लिए छोड दिया है। अरुणा को देख कर हर किसी किसीका दिल पसीज उठता है। अरूणा के वकील ने उसके मृत्यु की याचना की है, सुप्रीम कोर्ट में। उनके साथ हुए कुकर्म का उन्हे इंसाफ तो नही मिला, लेकिन जिंदा लाश ढोना अब मुमकिन नही। अरुणा की कहानी सुनकर और हालत देखकर कलेजा कांप उठा उठता है। कोर्ट से यही निवेदन है कि उन्हे इज्जत की मौत बख्श दे। खत्म कर दे उनकी शारीरिक पीडा को। जीवन के 36 साल से शारीरिक और मानसिक पीडा से बेहाल अरूणा की देखभाल मुंबई के के.ई.एम अस्पताल की नर्सें और कर्मचारी कर रहे है। अरूणा का बस यही परिवार है, जो कि खून के रिश्ते से बढकर। खून के रिश्तेदार भी तिमारदारी करने में हिचकिचाते है, लेकिन अस्पताल कर्मी नही। उनको तो सलाम है, लेकिन आज भगवान के अस्तित्व पर शंका हो रही है। भगवान को माननेवालों में से मैं जरूर हूं, लेकिन आज इस दर्द को देखकर लग रहा है कि भगवान है ही नही, होते तो इतने निष्ठुर नही होते। सरकार से निवेदन है कि कानून में कुछ प्रावधान करें ऐसे मार्मिक मामलों की तह में जाकर के पीडितों के दु:खों को दूर करे। उस फाईल को खोलकर उस वहशी दरींदे को मृत्यूदंड की सजा सुनाये जिसने एक नाजूक सी जिंदगी को बर्बाद कर दिया।