Tuesday, June 22, 2010

कब मिलेगी प्यार को मान्यता ?

दिल्ली में बहन और उसके प्रेमी की हत्या कर दी गयी साथ दुसरी बहन भी लापता है। भाईयों ने बहन और उसके प्रेमी को गोली मारकर उनकी लाश को गाडी में छोड दिया, उनका जुर्म बस यही था की उन्होने प्यार किया था। झुठी शान को चुनौती दी थी। झुठी शान को बचाने के लिए सरेआम उनका कत्ल किया गया। दुसरी एक घटना में प्रेमी जोडे को बांधकर उन्हे डंडे से पीटकर अधमरा कर दिया और उसके बाद बीजली का शॉक दे कर उनकी जान ली गयी। उस प्रेमी जोडे की जान लेनेवाले कोई दुसरे कोई नही थे बल्की बेटी के पिता और ताउ ने इस घिनौनी घटना को अंजाम दिया है। और उनको कोई मलाल नही है की उन्होने दो प्यार करनेवालों की हत्या की। एक गावं की पंचायत ने तो प्रेमी शादीशुदा जोडे की आंखे निकालने का फर्मान दे दिया था। क्या प्यार इतना घिनौना कृत्य होता है जो इकसवी सदी में भी अपने समाज में मान्यता नही पा रहा है। आमतौर पर उत्तर भारत में इस तरह की घटना ज्यादा दिखायी पडती है। घर परिवार से ज्यादा समाज की चिंता होती है, बच्चों की खुशीयों से ज्यादा अंहकार का जतन किया जाता है। नाक उंची रखने के चक्कर में बच्चों के दिलों को जुती की नोक से कुचला जाता है। पुरूष प्रधान संस्कृती और अंहकार के चलते कई प्रेमीयों ने अपनी जान गवांयी है। या तो फिर उन्हे मार डाला गया है। अनपढ हो या फिर पढ लिखे लोग अहंकार में बच्चो के प्यार को पनपने नही देते, अगर प्यार में वे आगे भी बढ जाए तो परिवार का हवाला देकर उनके सपने के घरौंदो को चकनाचुर कर दिया जोता है, यह बात उनके मन को स्पर्श भी नही करती की अपने बच्चोंने के एक दुसरे के साथ मिलकर कुछ सपने संजोये होंगे कुछ इच्छा होगी, कोई भविष्य देखा होगा। सब बातों को दर किनार किया जाता है, और अंहम सब पर हावी हो जाता है। पता नही कब मिलेगी हमारे समाज में सच्चे और पवित्र एहसास जिसे हम प्यार कहते है उसे मान्यता। कब मिलेगा सम्मान उस प्यार को। कब मिलेगी उस पवित्र रिश्ते को मंगलकामना का आशीर्वाद । बस हर बार हम अपने आप से यह सवाल पुछते आ रहे है। लेकीन क्या हम अपने ही घर में उसका स्विकार करते है। सनी नामक एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका के अपाहिज होने के बावजूद भी चार साल तक उसकी देखभाल की, हरपल उसका साथ निभाया, प्रेमिका के रूखस्त होने के बाद सनी अब उसके प्रेमिका के याद मे जिंदा है। प्रेमिका आरती के मौत के बाद सनी उसकी यादों के सहारे समाज की सेवा करना चाहता है, आरती सनी की प्रेरणा बन गई है। और तो और वो आरती को परिवार को भी सहारा दे रहा है। प्यार एक ऐसी अनुभुती है, जो जाती धर्म से परे है, संतुष्टी और समर्पण का एहसास है। एक दुसरे के सहारे किसी भी कठिनाईयों का सामना करने के लिए तैय्यार रहते है। प्यार में अश्लीलता नही होती वो एक ऐसा पवित्र रिश्ता है जो जिंदगी भर आपको हिम्मत देता है। बस समाज से इतनी ही बिनती है की, प्यार को अपनाईये उसे दुत्कारीये मत। यह कोई अपराध नही है। ऑनर किलींग केसेस की तादात बढती जा रही है, लेकीन दिमागी वैहशियत पारिवारीक सुख और शांती को रौंद रही है। प्यार का सम्मान किजीए। खोखली शान परिवार का विनाश कर रही है।

फिर भी बरसो....

मुंबई में बरसात का आना मतलब मुसीबतों का दस्तक देना । बरसात का खुशनुमा माहैल किसे अच्छा नही लगता। चिलचिलाती धुप से निजात तो मिल जाता है लेकीन साथ साथ मुसीबतें भी आती है। यह सब देन है हमारे मुंबई महानगर पालिका की । हर साल लोगों से किये गये वादे और धोखाधडी का सिलसिला इस साल भी बरकरार है। प्री मॉन्सून में ही अलग अलग चार जगहों पर दिवार ढहने से तीन मासुम बच्चों की मौत हो गयी थी और कई जखमी भी हो गये थे। नालों की सफाई के बारें में पुछा जाए तो कमिश्नर और मुंबई की मेयर दोनो ने ही 90 प्रतिशत सफाई होने का दावा किया। लेकीन सारे दावे खोखले निकले जब रास्तों पर पानी जमने लगा मुंबई महानगरपालिका में शिवसेना की सत्ता है तो अपना कर्तव्य निभाने के लिए शिवसेना कार्यकारी अध्यक्ष उध्दव ठाकरे भी नालों की सफाई का मुआयना करने मेयर के साथ गये दो दिन नालों की सफाई का जायजा लिया और तिसरे दिन मेयर, कमिश्नर और कार्यकारी अध्यक्ष ने 12 लाख रूपये खर्च करके हेलिकॉप्टर से मुआयना किया।
मुंबई का चेहरा नरिमन पॉईंट, वर्ली,जूहू, चौपाटी जैसे इलाके बनते जा रहे है। जहां समुद्र की लहरो का लुत्फ उठाने के लिए सैलानी आते है, लहरों के साथ बारीश में भिंगने का मजा भी लुटते है। छुट्टीयों के दिन बारीश में भिगंना सभी को अच्छा लगता है। चौपाटी पर गरामा गरम भुट्टे और चाय की चुस्की भी लज्जतदार लगती है। नौजवानो की मौज मस्ती तब तक वाजीब है जब तक वे नशा ना करे, नशे के हालात में कईयों ने अपनी जान गवाई है। लाईफ गार्ड की कमी सैलानियों की सुरक्षा के लिए नाकाफी है। ये भी देन है हमारे मुंबई महानगरपालिका की। मुंबई वाकई में खुबसुरत है लेकीन सरकारी अनास्था ने उसे बेढंग बना दिया है। अवैध निर्माणों की वजह से पानी के प्राकृतीक बहाव पर प्रतिबंध लगता जा रहा है, और अवैध निर्माणों के मसिहा है सत्ता की कुर्सी पर बैठे हमारे राजनितीज्ञ या फिर कॉरपोरेटर.। तपती धुप की तपीश से निजात देने वाले मेघ की राह देखनेवाले मुंबईकरों को बारीश का पानी मुसीबत लगने लगता है। हरसात के दौरान ट्रेन बंद होना, गंदे पानी में से घर तक का सफर तय करना, ट्रॅफिक में से निकलकर सही समय पर ऑफिस पहूंचने की कोशीश अब बरसात में आम सी हो गयी है। इतनी सारी कठिनाइयों और मुसीबतों के बावजूद आम मुंबईकर यही कहेगा, बरसो रे मेघा मेघा बरसो रे मेघा बरसो, जम के बरसो.....

भिखारीयों का साम्राज्य........

रात के करीब 9 बज रहे होगें मुसलाधार बारीश में रास्ता तय करते मै और मेरे दोस्त स्टेशन पर टिकट लेने के लिए कतार में खडे हो गये। कतार में खडे थे तभी चट्ट चट्ट दो आवाजें आयी, बांयी तरफ मुडकर देखा तो एक उम्रदराज महिला ने सात या आठ साल की बच्ची के मुंह पर दो तमाचे जड दिये थे। वह बच्ची उस महिला की बेटी नही थी या कोई रिश्तेदार नही थी। या उसने कुछ गलती भी नही की थी। उसकी गलती बस यही थी की टिकट के कतार में खडे हुए लोगों में से किसीने एक रूपया दे दिया था। वह महिला और वह बच्ची दोनो ही भीक मांगनेवाले थे और दोनो ही कतार के दोनो बाजू में खडी थी। बच्ची तो एक रूपया पा गयी लेकीन महिला को कुछ नही मिलने की वजह से वह आग बबूला हो गयी और उसने बच्ची के मुंह पर दो तमाचे जड दिये और उसे भलाबूरा कहने लगी। मानो उसके इलाके में वह कब्जा करने आयी हो। आमतौर पर भिखारीयों के भी अपने इलाकों का बटवारां होता है, ताकी कोई दुसरा उनकी जगह पर अपना साम्राज्य न बनाये। बुजुर्ग महिलाएं और पुरूष इस उम्र में काम नही कर सकते तो वे दुसरों के आगे हाथ फैलाने पर मजबूर होते है। गुस्सा तब आता है जब इनकी तादात को देखती हूं। नन्हे नन्हे 4-5 बच्चों से कम नही । गंदगी से लतपत इन बच्चों को इनके ही मां बाप भीख मांगने पर मजबूर करते है। जिस उम्र से बच्चे बोलना या मसझना शुरू करते है। इस उम्र से यह बच्चे पेट की तरफ इशारा करके पैसे मांगते है। खाने पिने की चिजे दो तो वे नही लेते उन्हे चाहिए तो बस पैसा और पैसा ही। पेट की आग बुझाने के लिए लोग क्या क्या नही करते। अपनी आस्था से लोग समंदर में एक या दो रूपये फेकते है, लहरों के साथ फिर किनारे की तरफ आनेवाले पैसौं को लपकने के लिए कई बच्चे अपनी जान तक खतरे में डाल देते है। सर्व शिक्षा अभियान की मुख्यधारा में आना इन बेहद मुश्कील और नामुमकीन बात होगी, लेकीन दुसरो के सामने हाथ फैलाता बचपन, कुछ भी नही समझ पाने की उम्र में भीख मांगकर अपने पेट की आग बुझानेवाले इन बच्चों के भविष्य में सिर्फ अंधेरा ही नजर आता है। ये बच्चे बडे भी हो जाएंगे यु हीं भीख मांगते मांगते लेकीन न समाज में कोई स्थान होगा ना सरकार से मदत की कोई उम्मीद । मिलेगी तो सिर्फ दुत्कार और लाचारी। भिखारीयों का भी अपना एक अलग समाज बनने लगा है। वहां भी खूब कमाई है। उनका का भी अपना एक अलग साम्राज्य बनता जा रहा है, जहां घुसखोरी करने पर सजा मिलती है। नन्हे बच्चे के मुंह पर तमाचे की गुजं और बडों का कत्ल भी हो सकता है।

Monday, April 19, 2010

न्याय की उम्मीद जगेगी.......

महाराष्ट्र के पुणे जिले के हिंजवडी इलाके में एम.बी.ए छात्रा से हुए बलात्कार मामले की सुनवाई फास्ट ट्रॅक कोर्ट में करने की घोषणा महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर. पाटील ने करते ही दुसरे ही दिन बलात्कार होने के दो मामले उजागार हूए । पुणे में एक सप्ताह में ही बलात्कार के चार मामले सामने आये। एक मामला तो इतना शर्मनाक है की जहां रक्षक ही भक्षक बन गये। राजपुताना रायफल्स के दो जवानों ने एक लडकी की इज्जत को तार तार कर ही दिया, उसके प्रेमी को पिट- पिटकर बेहोश कर दिया। जवानों की बेशर्मी तो इतनी की पहले दिन उस लडकी के दामन पर दाग लगाया, दुसरे दिन उस लडकी को फोन करके फिर मिलने बुलाया। फोन आने के पश्चात लडकी ने पुलीस स्टेशन में उनके खिलाफ केस दर्ज कराया। अब दोनो दरिंदे सलाखों के पिछे है। भारतीय न्यायव्यवस्था में न्याय मिलने में सालोसाल लग जाते है। कहीं पर गवाह मुकर जाते है, तो कहीं पर सबूतों के अभाव में न्याय ही नही मिल पाता। कहीं पर कानून को ही खरीदा जाता है तो कहीं पर कानून पर सियासी दबाब डाला जाता है। जिसकी अस्मत लूटी जाती है, उसके बारे मे सोचकर ही दिल दहल जाता है। दिन ब दिन बढती वारदात से अब नारीजाती को डर लगने लगा है। हर वक्त चौकन्ना रहना पडता है। घर आने जाने के लिए परिजनों और दोस्तो का सहारा लेना पडता है। जिस महिला के साथ ऐसा वाकया होता है उसकी जिंदगी तो मानो एक जिंदा लाश ही बन जाती है। समाज के साथ साथ परिवार के ताने उसके तन मन को छलनी कर देते है। तरह तरह के सवाल उस पीडीता पर दागे जाते है, अकेली क्यों गयी, वेशभुषा किस तरह की थी पुरे देश में ही फास्ट ट्रॅक कोर्ट में हर बलात्कार मामले की सुनवायी होना जरूरी है तभी जाकर दरिंदगी के कई मामले सामने आ सकते है जो सामाजिक और पारिवारीक डर के चलते दफनाये जाते है। फास्ट ट्रॅक कोर्ट में सुनवायी होने से समाज के दरिंदो पर नकेल कसी जा सकती है। साथ ही उनके मन में कानून का डर बना रहेगा। बशर्तै उनके सरपर किसी राजनेता का हाथ ना हो। देशभर में अगर फास्ट ट्रॅक कोर्ट में पीडीता को न्याय मिलेगा तो महिलाओं पर हो रहे अत्याचार का असली चेहरा सामने आयेगा और उन्हे न्याय मिलने की उम्मीद जगेगी। दिन-ब दिन वहशियत का निवाला बननेवाली महिलाओं और बच्चीयों को कानूनी मदत के साथ पारिवारीक और मामाजिक सहायता और प्यार मिलना बेहद जरूरी है, तभी जाकर उनके मन की अपराधिक भावना को खत्म किया जा सकता है। आईये हम और आप मिलकर समाज में हो रहे अन्याय के प्रती जागरूकता फैलाये और जिन पर पहाड टूटा है उनका दर्द कम तो नही कर सकते लेकीन समाज में उन्हे इज्जत से जीने के लिए मदत जरूर कर सकते है।

Thursday, April 8, 2010

खिलेगा या मुरझायेगा बचपन…

बचपन को खिलखिलाता बनाने के लिए सरकार ने हर बच्चे के लिए शिक्षा का अधिकार लागू कर दिया क्या होगा इस अधिकार मैं उधेडबुन में सोच रही थी। रोजमर्रा की तरह ट्रेन का सफर शुरू था। महिला डि्ब्बे में महिलाओ के उपयोग में आनेवाली चीजे बेचने के लिए महिला और बच्चों का आना जाना लगा रहता है। आज फूल बेचने के लिए दो बच्चियां चढी । पूरे डिब्बे में उन्होने आवाज लगाई, किसी को फूल पसंद नही आये तो किसी को दाम। दोनो बच्चियां ने जब देखा कि किसी को फूल में दिलचस्पी नहीं है तो थक हार कर सीट पर बैठ गयीं। उत्सुकता में एक महिला ने एक बच्ची से उसकी उम्र पूछी, बडे मासूमियत से उसने उंगली को नीचे मोडकर सात अंक बनाया। मुझे भी उसके भोलापन ने दिल की गहराईयों तक छू डाली। मै पूछ बैठी कि स्कूल जाती हो, तो उन दोनों ने सिर हिलाकर नही का जवाब दिया। सभी को प्रायमरी शिक्षा मिलने के मकसद से प्रधानमंत्रीजी ने शिक्षा के प्रावधान के लिए कडे कानून बनाये। देश को संबोधित करके उन्होने देशवासियों के शिक्षा के महत्व से अवगत कराने की कोशिश की। लेकिन मायानगरी मुंबई में सैंकडों बच्चे है जो शिक्षा से वंचित है। यहाँ पूरा परिवार किसी तरह रोटी पानी का जूगाड कर पाता है। इनके सामने गरीबी सुरसा की तरह मुँह बाए खजी रहती है। ऐसे परिवार सोंच में पड जाता है कि पहले ही घर मे गरीबी का आलम और उसमें अगर बच्चे पढाई करे तो फिर वो खायेंगे क्या। सरकार ने तो प्राइमरी शिक्षा मुफ्त तो करा दी साथ ही प्राइवेट स्कूलों को भी गरीब बच्चों के लिए कोटा रखने को कहा गया। लेकिन यहाँ कहानी अलग थी, चार-पांच साल की उम्र में ही ये बच्चे अपने परिवार के भरण पोषण के लिए जवान हो गये हैं। इन्हे अगर मु्फ्त मे भी शिक्षा दी जाए तो भी वो शायद पढने नही जाएंगे। घर में ना तो मां पढी है ना पिता तो इन बच्चों में पढने की लगन और चाहत कहा से पैदा होगा। दिन भर सामान बेचने के लिए यहां से वहां जाना, रास्ते में अटपटी चीजे खाकर जीवन गुजार देना, यही जिंदगी इनको अच्छी लगने लगती है। इन बच्चों के मन में शायद यही है कि पढाई करने से क्या होगा पढ लिखकर तो पैसे ही कमाने है, सो अभी से ही कमा रहे है। पढाई के प्रति अरूची सिर्फ गरीब तबके में ही नजर आती है जिन्हे रोज कमाकर ही खाना होता है। मध्यम वर्ग से आनेवाले बच्चों के परिजन बच्चों के पढाई के लिए जी जान लगाते है। और उच्चवर्ग की तो बात ही ना करे तो बेहतर होगा। उनके लिए तारे जमीन पर ही होते है। देश में कई ऐसे बच्चे है जो बिना पढे लिखे अकेले अपने परिवार का पेट पाल रहे है।
सरकार का मकसद है कि प्राथमिक शिक्षा हर तबके के लिए अनिवार्य हो, ताकि देश मे कोई भी निरक्षर ना रहे, और देश का भविष्य उज्जवल हो। लेकिन क्या सरकार गरीब बच्चों को शिक्षा देने के लिए उनपर सख्ती करके उन्हे शिक्षा देगी या फिर जो पढना चाहेगा उन्हे मदत का हाथ बढा हुआ मिलेगा। क्या फुल बेचनेवाली इन बच्चियों या मजदूरी करनेवाले बच्चों को अनिवार्य शिक्षा देकर उनका बचपन खिलेगा या फिर उनके हाथों से काम छीनकर उनको भूखा रखकर उनका बचपन को मुरझा जाने दिया जाएगा।

अंधविश्वास में जलते बच्चे.....

पिछले एक महीने से खबरों में मैं बराबर देख रही हूँ कि बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड किया जा रहा है। ये लगातार देखती आ रही हूं कि दूधमुहे बच्चो को मंदिर की चोटी से नीचे फेंका जाता है, और नीचे कुछ लोग चादर पकड कर उन्हे लपकने के लिए खडे रहते है। महाराष्ट्र के सांगली जिले में चैत्र महीने में देवी देवताओं की यात्रा होती है। जिन्होंने बच्चो के लिए मन्नत मांगी होती है वो अपनी मन्नत पूरी करने के लिए बच्चो की जान से खेलते नजर आते है। शायद यह सिलसिला एक महीने भर तक सीमित नही बल्कि कई वर्षों से चला आ रहा होगा। बच्चों की जान से खिलवाड करना महाराष्ट्र ही नही बल्कि अन्य राज्यों में भी होता है। महाराष्ट्र के सांगली और परभणी के नन्हे बच्चों को पचास से साठ फीट नीचे फेंका जाता है। दूसरा एक वाकया देखा जिसमें बच्चों को एक पालने जैसे लकडी के बक्से में बिठाकर पानी में डूबो कर बाहर निकाला जाता है। उपर से उंचाई से यह बक्सा नीचे रस्सी से बांधकर छोडा जाता है। अगर किसी के हाथ से रस्सी छूट गयी या बैलेन्स खो गया तो समझ लें कि बच्चा पानी में डूबेगा जरूर। रोते बिलखते बच्चों को देखकर उनके मां बाप को जरा भी उनपर दया नही आती। रोते रोते अगर दम घूट गया या फिर उपर से नीचे गिराते वक्त कुछ हादसा हो गया तो। गिरते वक्त बच्चे का हाथ पैर टूट गए तो लेने के देने पड सकते है। रोते बिलखते मासूमों को देखकर सामाज में बढ रही अंधविश्वास बेहद क्रोध होता है। भगवान के प्रति श्रद्धा रखना या उनमें आस्था होना कोई गलत बात नही लेकिन अंधविश्वास में बहकर कोई गलत काम करके या किसी को तकलीफ पहुँचाने पर भगवान तो कोई आशीर्वाद देने से रहे। भगवान भक्ति का भूखा होता है, उन्हे इस तरह के कर्म कांड करके प्रसन्न नही किया जा सकता। दूसरा समाज को कलंकित करनेवाला वाकया था, महाराष्ट्र के परभणी जिले में पाच बच्चों की अचानक मौत। किसीको कुछ भी पता नही चल पाया कि इस तरह बच्चो की मौत कैसे हो गयी। गांववालों को भूत प्रेत की आशंका थी। लेकिन बच्चों को दफनाने के बाद प्रशासन ने लाशों का पोस्टमार्टम कर मौत की वजह का पता लगाने की ठान ली। हर कोई वहां जाने से डरने लगा पुलिस भी वहां गश्त के दौरान पे़ड के नीचे बैठने या सोने से डरने लगी। लाश को फिर खोदकर निकाला गया और उन्हे पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। दो बच्चो के रिपोर्ट के जरिए कुछ पता नही चल पाया लेकिन अन्य तीन बच्चों की रिपोर्ट से यह पता चला कि उन्हे जहर देकर मार डाला गया था। जहर देनेवाले की उन बच्चों के परिजनों से कोई दुश्मनी नही थी बल्कि जिन्होने जहर दिया उन्हे संतान नही थी, और संतान पाने के लिए उन्होने नरबली का प्रयोग किया। बच्चों की बली चढाने से संतान की प्राप्ती होती है इस अंधविश्वास में पाच बच्चे एक ही दिन मारे गये शायद अनगिनत बच्चे ऐसे षडयंत्र का शिकार होते चले आ रहे है। तांत्रिक और मांत्रिक से धनलाभ, संतान प्राप्ती होना नामुकिन बात है। आज मेडिकल साइन्स ने इतनी तरक्की कर ली है कि टेस्ट ट्यूब बेबी का विकल्प आप चुन सकते है। महाराष्ट्र में नही बल्कि पूरे भारत में अंधश्रध्दा ने अपनी जडे फैलाई है, और उसके शिकार बन रहे है, अनगिनत मासुम अंधविश्वास जीवन को नरक बना देती है। कई इसके चलते जेल की हवा भी खा रहे है। सच्ची श्रध्दा के साथ साथ मेहनत. लगन और हौसला हो तो रास्ते में कोई भी मुश्किल आए उसे पार कर आप जरूर सफल होगें। अंधश्रध्दा को खत्म करने के लिए आप भी अपने आस पास हो रहे अन्याय को रोकने में जरूर मदत करे.........

Monday, April 5, 2010

शोषण अभी भी जारी है...

देश इक्कसवी सदी में पहुँच रहा है और महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए सदन में पुरजोर बहस भी हो रही है। लेकिन महिलाओ के साथ दिन ब दिन अत्याचार बढते उत्याचार में कोई कमी नहीं। आधुनिक समाज में जो नर पिशाच हैं वो महिलाओं को मात्र हवस की नजर से देखते हैं, और जब ताक मिले हवस पूरा करने का सामान मान कर अपने हवस की भूख मिटाते रहे हैं। इन नर पिशाचों ने ना तो किसी साठ साल की बुछिया को छोडा, ना किसी अबला को ना ही किसी विकलांग को ना ही किसी अबोध बच्ची को ही छोडा। दो दिन पहले महाराष्ट्र के पुणे जिले में पच्चीस साल की एक महिला को लिफ्ट देने के बहाने उसे हवस का शिकार बनाया। ये महिला अच्छी खासी एमबीए तक पढी है और सेमिनार में शामिल होने के लिए नागपूर से पुणे आयी थी। गाडी में बिठाकर तीन शौतानों ने उसे जबरन शराब पिलाकर उसकी इज्जत को तार तार कर दिया। इन शैतानों में से एक आरोपी को पहले ही तडीपारी की सजा सुनायी गयी थी, लेकिन पूर्व मंत्रीजी के आशीर्वाद से यह तडीपारी रोकी गयी थी। वहीं लातूर में एक लडकी पर सामूहिक बलात्कार किया गया। गरीब घर की बच्ची की खुशहाल जिंदगी तबाह कर दी। वहीं नासिक में अदिवासी छात्रावास में एक बावर्जी छात्राओं का कई महिनों से लैंगिक शोषण करता आ रहा था। पढे लिखे हो, या फिर अनपढ। महिला हो या बच्चियां सबों के साथ ये नराधम अपनी हवस की लालसा पूरी करते रहते हैं। लगता है बलात्कार करना या लैंगिक शोषण करना अब आम बात हो गयी है, न कानून का डर है ना ही समाज का। ज्यादातर मामलों में उनके सरपर किसी ना किसी गॉडफादर का हाथ होता है । चकलाघर, डान्सबार में जाकर शराब और शबाब का लुत्फ उठाकर अय्याशी करनेवालों इन जानवरों की इतनी हिम्मत बढ गयी है कि अब महिलाओं का अकेली घर से निकलना भी मुश्किल हो गया है। क्यों इन नशेडियों की इतनी हिम्मत बढती जा रही है कि रोज कहीं ना कहीं महिलाएं हवस का शिकार बन रही है। यू.पी में तो दलित महिला के साथ गजब का न्याय किया गया । सामुहिक बलात्कार करने के बाद आरोपियों को गाव की पंचायत ने सजा सुनायी। बलात्कार करनेवाले आरोपियों को कानून की गिरफ्त में ना देते हूए उन्हे बारह हजार जुर्माना भरने को कहा गया। अजीब न्याय है, क्या किसी कि अस्मत को रुपयों से तौला जा सकता है। घोर आश्चर्य होता है अब तो यही कहा जा सकता है कि जुर्माने की रकम इकठ्ठा करके रखिए और बलात्कार करके जाए। क्या यही न्याय सवर्ण घर के किसी संभ्रात महिला से बलत्कार किए जाने पर होता ? भले ही महिला किसी जाति धर्म और समप्रदाय की हो, लेकिन ऐसी हरकत कभी नहीं होनी चाहिए। आज क्यों महिलाओं को आजादी नही मिल पा रही है ? रात में अगर देर हो जाए तो जान हथेली पर लेकर निकलना पडता है। क्यों इतनी ज्यादा हैवानियत बढती जा रही है। पुरूष किसी ना किसी महिला के कोख से ही पैदा होते हैं। पुरुषों को इस सवाल का जवाब देना चाहिए चाहिए। हवस की आग में एक लडकी के साथ उसका पूरा परिवार जलता है। क्या कसूर होता है उन मासुमों का। सरकारें सोती रहती हैं कम से कम कुछ सच्चे पुलिस वाले तो हों जिनके होने पर सुरक्षा महसूस किया जा सके। काम काज करके घर खुशी से लौटती महिलाए आज डरती हैं कि घर सही सलामत पहुँच पाएँगी या नहीं। ट्रेनों में सुरक्षा देने का निर्णय लिया गया था लेकिन वो भी चार दिन की चाँदनी वाली कहावत है। इन वहशी लोगों को इतनी कडी से कडी सजा दी जाए ताकी जुर्म करने वालों की रूंह काप उठे । सरे आम इन दरिंदो के हाथ,पैर काट दिये जाने चाहिए ताकी इनको सबक मिल सके। कहते हैं कि हमारा देश प्रजातांत्रिक है लिहाजा ऐसी सजा की कल्पना की जा सकती है लेकिन सतही तौर पर ऐसी सजाएँ नहीं दी सकती। कहना तो यही पडेगा कि जागो मनुज के पुत्रों जिसे कहते हो जननी उसी पर तुम्हारी निगाहें गन्दी है। पूत कपूत तो हो सकता है लेकिन माता कुमाता नहीं होती तो संभलो और अपनी ही माता को बचा लो।