Thursday, April 8, 2010

अंधविश्वास में जलते बच्चे.....

पिछले एक महीने से खबरों में मैं बराबर देख रही हूँ कि बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड किया जा रहा है। ये लगातार देखती आ रही हूं कि दूधमुहे बच्चो को मंदिर की चोटी से नीचे फेंका जाता है, और नीचे कुछ लोग चादर पकड कर उन्हे लपकने के लिए खडे रहते है। महाराष्ट्र के सांगली जिले में चैत्र महीने में देवी देवताओं की यात्रा होती है। जिन्होंने बच्चो के लिए मन्नत मांगी होती है वो अपनी मन्नत पूरी करने के लिए बच्चो की जान से खेलते नजर आते है। शायद यह सिलसिला एक महीने भर तक सीमित नही बल्कि कई वर्षों से चला आ रहा होगा। बच्चों की जान से खिलवाड करना महाराष्ट्र ही नही बल्कि अन्य राज्यों में भी होता है। महाराष्ट्र के सांगली और परभणी के नन्हे बच्चों को पचास से साठ फीट नीचे फेंका जाता है। दूसरा एक वाकया देखा जिसमें बच्चों को एक पालने जैसे लकडी के बक्से में बिठाकर पानी में डूबो कर बाहर निकाला जाता है। उपर से उंचाई से यह बक्सा नीचे रस्सी से बांधकर छोडा जाता है। अगर किसी के हाथ से रस्सी छूट गयी या बैलेन्स खो गया तो समझ लें कि बच्चा पानी में डूबेगा जरूर। रोते बिलखते बच्चों को देखकर उनके मां बाप को जरा भी उनपर दया नही आती। रोते रोते अगर दम घूट गया या फिर उपर से नीचे गिराते वक्त कुछ हादसा हो गया तो। गिरते वक्त बच्चे का हाथ पैर टूट गए तो लेने के देने पड सकते है। रोते बिलखते मासूमों को देखकर सामाज में बढ रही अंधविश्वास बेहद क्रोध होता है। भगवान के प्रति श्रद्धा रखना या उनमें आस्था होना कोई गलत बात नही लेकिन अंधविश्वास में बहकर कोई गलत काम करके या किसी को तकलीफ पहुँचाने पर भगवान तो कोई आशीर्वाद देने से रहे। भगवान भक्ति का भूखा होता है, उन्हे इस तरह के कर्म कांड करके प्रसन्न नही किया जा सकता। दूसरा समाज को कलंकित करनेवाला वाकया था, महाराष्ट्र के परभणी जिले में पाच बच्चों की अचानक मौत। किसीको कुछ भी पता नही चल पाया कि इस तरह बच्चो की मौत कैसे हो गयी। गांववालों को भूत प्रेत की आशंका थी। लेकिन बच्चों को दफनाने के बाद प्रशासन ने लाशों का पोस्टमार्टम कर मौत की वजह का पता लगाने की ठान ली। हर कोई वहां जाने से डरने लगा पुलिस भी वहां गश्त के दौरान पे़ड के नीचे बैठने या सोने से डरने लगी। लाश को फिर खोदकर निकाला गया और उन्हे पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। दो बच्चो के रिपोर्ट के जरिए कुछ पता नही चल पाया लेकिन अन्य तीन बच्चों की रिपोर्ट से यह पता चला कि उन्हे जहर देकर मार डाला गया था। जहर देनेवाले की उन बच्चों के परिजनों से कोई दुश्मनी नही थी बल्कि जिन्होने जहर दिया उन्हे संतान नही थी, और संतान पाने के लिए उन्होने नरबली का प्रयोग किया। बच्चों की बली चढाने से संतान की प्राप्ती होती है इस अंधविश्वास में पाच बच्चे एक ही दिन मारे गये शायद अनगिनत बच्चे ऐसे षडयंत्र का शिकार होते चले आ रहे है। तांत्रिक और मांत्रिक से धनलाभ, संतान प्राप्ती होना नामुकिन बात है। आज मेडिकल साइन्स ने इतनी तरक्की कर ली है कि टेस्ट ट्यूब बेबी का विकल्प आप चुन सकते है। महाराष्ट्र में नही बल्कि पूरे भारत में अंधश्रध्दा ने अपनी जडे फैलाई है, और उसके शिकार बन रहे है, अनगिनत मासुम अंधविश्वास जीवन को नरक बना देती है। कई इसके चलते जेल की हवा भी खा रहे है। सच्ची श्रध्दा के साथ साथ मेहनत. लगन और हौसला हो तो रास्ते में कोई भी मुश्किल आए उसे पार कर आप जरूर सफल होगें। अंधश्रध्दा को खत्म करने के लिए आप भी अपने आस पास हो रहे अन्याय को रोकने में जरूर मदत करे.........

Monday, April 5, 2010

शोषण अभी भी जारी है...

देश इक्कसवी सदी में पहुँच रहा है और महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए सदन में पुरजोर बहस भी हो रही है। लेकिन महिलाओ के साथ दिन ब दिन अत्याचार बढते उत्याचार में कोई कमी नहीं। आधुनिक समाज में जो नर पिशाच हैं वो महिलाओं को मात्र हवस की नजर से देखते हैं, और जब ताक मिले हवस पूरा करने का सामान मान कर अपने हवस की भूख मिटाते रहे हैं। इन नर पिशाचों ने ना तो किसी साठ साल की बुछिया को छोडा, ना किसी अबला को ना ही किसी विकलांग को ना ही किसी अबोध बच्ची को ही छोडा। दो दिन पहले महाराष्ट्र के पुणे जिले में पच्चीस साल की एक महिला को लिफ्ट देने के बहाने उसे हवस का शिकार बनाया। ये महिला अच्छी खासी एमबीए तक पढी है और सेमिनार में शामिल होने के लिए नागपूर से पुणे आयी थी। गाडी में बिठाकर तीन शौतानों ने उसे जबरन शराब पिलाकर उसकी इज्जत को तार तार कर दिया। इन शैतानों में से एक आरोपी को पहले ही तडीपारी की सजा सुनायी गयी थी, लेकिन पूर्व मंत्रीजी के आशीर्वाद से यह तडीपारी रोकी गयी थी। वहीं लातूर में एक लडकी पर सामूहिक बलात्कार किया गया। गरीब घर की बच्ची की खुशहाल जिंदगी तबाह कर दी। वहीं नासिक में अदिवासी छात्रावास में एक बावर्जी छात्राओं का कई महिनों से लैंगिक शोषण करता आ रहा था। पढे लिखे हो, या फिर अनपढ। महिला हो या बच्चियां सबों के साथ ये नराधम अपनी हवस की लालसा पूरी करते रहते हैं। लगता है बलात्कार करना या लैंगिक शोषण करना अब आम बात हो गयी है, न कानून का डर है ना ही समाज का। ज्यादातर मामलों में उनके सरपर किसी ना किसी गॉडफादर का हाथ होता है । चकलाघर, डान्सबार में जाकर शराब और शबाब का लुत्फ उठाकर अय्याशी करनेवालों इन जानवरों की इतनी हिम्मत बढ गयी है कि अब महिलाओं का अकेली घर से निकलना भी मुश्किल हो गया है। क्यों इन नशेडियों की इतनी हिम्मत बढती जा रही है कि रोज कहीं ना कहीं महिलाएं हवस का शिकार बन रही है। यू.पी में तो दलित महिला के साथ गजब का न्याय किया गया । सामुहिक बलात्कार करने के बाद आरोपियों को गाव की पंचायत ने सजा सुनायी। बलात्कार करनेवाले आरोपियों को कानून की गिरफ्त में ना देते हूए उन्हे बारह हजार जुर्माना भरने को कहा गया। अजीब न्याय है, क्या किसी कि अस्मत को रुपयों से तौला जा सकता है। घोर आश्चर्य होता है अब तो यही कहा जा सकता है कि जुर्माने की रकम इकठ्ठा करके रखिए और बलात्कार करके जाए। क्या यही न्याय सवर्ण घर के किसी संभ्रात महिला से बलत्कार किए जाने पर होता ? भले ही महिला किसी जाति धर्म और समप्रदाय की हो, लेकिन ऐसी हरकत कभी नहीं होनी चाहिए। आज क्यों महिलाओं को आजादी नही मिल पा रही है ? रात में अगर देर हो जाए तो जान हथेली पर लेकर निकलना पडता है। क्यों इतनी ज्यादा हैवानियत बढती जा रही है। पुरूष किसी ना किसी महिला के कोख से ही पैदा होते हैं। पुरुषों को इस सवाल का जवाब देना चाहिए चाहिए। हवस की आग में एक लडकी के साथ उसका पूरा परिवार जलता है। क्या कसूर होता है उन मासुमों का। सरकारें सोती रहती हैं कम से कम कुछ सच्चे पुलिस वाले तो हों जिनके होने पर सुरक्षा महसूस किया जा सके। काम काज करके घर खुशी से लौटती महिलाए आज डरती हैं कि घर सही सलामत पहुँच पाएँगी या नहीं। ट्रेनों में सुरक्षा देने का निर्णय लिया गया था लेकिन वो भी चार दिन की चाँदनी वाली कहावत है। इन वहशी लोगों को इतनी कडी से कडी सजा दी जाए ताकी जुर्म करने वालों की रूंह काप उठे । सरे आम इन दरिंदो के हाथ,पैर काट दिये जाने चाहिए ताकी इनको सबक मिल सके। कहते हैं कि हमारा देश प्रजातांत्रिक है लिहाजा ऐसी सजा की कल्पना की जा सकती है लेकिन सतही तौर पर ऐसी सजाएँ नहीं दी सकती। कहना तो यही पडेगा कि जागो मनुज के पुत्रों जिसे कहते हो जननी उसी पर तुम्हारी निगाहें गन्दी है। पूत कपूत तो हो सकता है लेकिन माता कुमाता नहीं होती तो संभलो और अपनी ही माता को बचा लो।

रास ना आयी जिंदगी............

केवल ढाई अक्षरों में संसार समा सकता है और वो है “प्रेम”। इसमें जो डूबा वो संसार को पा सकता है लेकिन शर्त ये है कि वो नि:स्वार्थ हो। अक्सर ये होता भी नि:स्वार्थ ही। लेकिन इस पर नजर लग जाती है समाज और घर परिवार के लोगों की ही। दिल्ली में रविवार का दिन दो प्रेमी जोडे का आखरी दिन साबित हुआ। जोडे ने प्यार किया लेकिन उसके प्यार को कबूला नहीं समाज और घर ने। लिहाजा 22- से 25 उम्र के इन दो प्रेमी जोडो ने उपनी जीवनयात्रा को विराम दे दिया। एक जोडे ने ट्रेन के सामने आकर अपने प्यार को मरते मरते गले लगा लिया तो दूसरे जोडे ने पुल से नीचे कुदकर साथ साथ मरने की कसम को ही पूरा कर लिया। चाँद तो छोडिए हम मंगल पर पहुँच गए हैं साल बीतते 2010 तक हम पहुँच चुके है लेकिन समाज में आज भी प्यार को हेय नजर से देखा जाता है। जैसे प्यार ना हो कोई बदबूदार पदार्थ हो और महमारी फैलाने वाली बीमारी हो, पांव तले रौदने से में कोई हिचकता तक नहीं। उंची और नीत जात, गरीब और अमीर का भेद आज भी बरकरार है, चाहे हम विश्व की उत्पत्ती का खोज लगा ले या फिर मंगल पर जीवन को खोज आए। प्यार कभी भी किसी ने ये सोच कर नहीं किया कि उनके प्यार का अंजाम क्या होगा। जीवन में कभी वो मिल भी पाएँगे या नहीं ये कोई नहीं सोचता ना ही कभी ये सोचते कि सामने से प्यार का तोहफा देने वाली उँची जाति का , नीची जात का है, गरीब है या किसी रईसजादे की संतान है। प्रेमी आपस में एक झलक निहारने के साथ प्यार के बदले केवल प्यार का ही व्यवहार रखते हैं, इसके अलावा ना ही कोई इच्छा होती ना कोई कामना बस प्यार ही प्यार। उनकी कतई यह इच्छा नही होती कि उनके चलते किसी को कष्ट हो,कभी भी परिवार में भूचाल आए। अगर प्यार को पूजा की तरह देखे तो परिवार में ऐसा कभी होगा भी नहीं। लेकिन पूजा कौन भगवान की मूर्ति पर पडे मैल की तरह देखते हैं लोग। मैं कहती हूँ कि जात और पात की दुहाई देने वाले लोग ये बताए कि क्या जाति आपके चेहरे पर लिखा होता है। ना ही आपके चेहरे पर किसी जाति का चिन्ह है और ना ही आपके सही तरीके के रहन सहन से पता चलता है। रही बात धर्म का तो पता चल सकता है लेकिन ये बताएये किस धर्म में लिखा है कि लोगों से नफरत करों प्यार के बदले किसी का जीवन ही छीन लो। एक कागज का वो पूर्जा नफरत का कारण बन जाता है जिसपर आपके जाति का पर्माण पत्र होता है। सदियों पहले जब वर्ण व्यवस्था नहीं थी उस समय क्यों नहीं जाति प्रथा थी। उपनिषदो में साफ लिखा है कि अगर आपके कुल में कोई नीच कुल से भी लडकी आती और अगर उसके व्यवहार आपके कुल से श्रेठ है तो वो आपके लिए आदरणीय है। इसे स्वीकार करना शास्त्र धर्म है। प्यार वो अनुभति है जो हल्की सर्दी में नम घास पर ओस की बूँद से भी रुमानी। अगर महसूस करें तो पैरों से लेकर अंतरआत्मा को तृप्त कर देती है। इसे पाने के बाद, जीने का वजूद मिल जाता है, जोश से प्रेमी जोडे सराबोर हेता है। वे अपने जीवन की छोटी सी छोटी खुशी को बडे ही प्यार से संजोए रखते है। आपसे में गम बाटंकर अपने दुखो के बोझ को हल्का कर लेते है। लेकिन समाज में प्यार का विरोध ना हो यह बात कभी हो ही नही सकती। जब प्यार किया तो डरना क्या, प्यार किया कोई चोरी नही की, ये हमें फिल्मों में ही अच्छा लगता है क्योंकि हर प्रेमी जोडे को प्यार होने के बाद डरना ही पडता है, भले ही वो आपस में प्यार बांटने का नेक काम ही क्यों न करते है। दो प्रेमियों के आपस में एक होने से समाज का क्या बुरा होनेवाला है, या फिर परिवार का। बच्चों के प्यार को परिवार के सहारे के जरूरत है, उनके प्यार के बेसहारा होने से बच्चे तो घुट-घुट कर मरते ही जीना पर भी कई चीजे सालते रहता है। जिन्दा तो रहते हैं लेकिन बुझे-बुझे मजबूरी हो जाती है। इन्हें साथ रहने दीजिए क्योकि साथ रहने की कसमें खाने वाले कब साथ मे मर जाए कोई नहीं जानता। उत्तर भारत में प्रेमीयों के विरोध की धार बहुत ही तेज है, जो हिम्मत करके अपने प्यार को चुनते है उनके लिए सजा का फर्मान निकलता है। एक सप्ताह पहले शादी करनेवाले जोडे की आंखे निकालने का तुगलकी फर्मान निकाला गया। हम स्वतंत्र देश में रहते है ना किसी गुलाम देश में जहाँ अवाज उठाने पर ही कत्ल का फरमान दे दिया जाता है। गुजारिश है उस परिवार से जो बच्चों को अपनी झूठी शान के लिए बलि चढा देते हैं , कम से इस कदर ना तो अपनी खुशी बरबाद करे और ना ही बच्चों की। भावनाओं की आग में झुलसाइए नहीं। जीते जी उनकी चिता में अग्नि ना दिया करें। मत छीनों उन परिन्दों का जीवन जो तुम्हारी जीवन के लिए ही अपनी जीवन की आहुति देने को तैयार हैं। क्या कहूँ मजबूरी है.... कुछ आप भी सोंचे ,क्या जो समाज में हो रहा है ठीक है।

Friday, March 19, 2010

महिलाओं के साथ दोतरफा व्यवहार....

9 मार्च 2010 का दिन भारतीय गणतंत्र में इतिहास के पन्नों में दर्ज होने के लिए गर्व से तैयार है। इस दिन राज्यसभा में एक ऐसा प्रस्ताव पारित किया गया जिसका जिक्र अब ऐतिहासिक घटना के रूप में होगा। देशभर की महिलाओं को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का तोहफा मिल गया । इन इतिहास की बातों से हर किसी का सीना गर्व से फूल गया है। महिलाएँ उत्साह और उमंग से लबेरेज हैं, अपनी जीत पर फूली नहीं समा रही हैं। हक और अधिकार मिलने का जज्बा दिल में था। बुलंदी छूने की भावना जगी थी। दुनिया को नापने और जीतने की उमंग जगी थी। अत्याचार के खिलाफ कमर कसने की तैयारी हो रही थी। लेकिन एक बात मैं जो कहने जा रही हूँ वो शायद कम ही लोगों को पता होगा, 10 मार्च को महाराष्ट्र के बीड जिले के एक गावं में एक महिला के साथ शर्मनाक हादसा हुआ। जिसको देखकर यही कहा जा सकता है कि सारे अधिकार केवल कागजों पर ही है। एक महिला को निर्वस्त्र करके सरेआम पीटा गया। शायद ये वाकया पहली बार नही हुआ होगा। इससे पहले भी महिलाओं के साथ ऐसी दर्दनाक घटनाएँ घटी है। बीड की इस महिला को पाचं भाईयों ने निर्वस्त्र करके पीटा, उसके पीछे का कारण कुछ अलग है, हालांकि इसे अब जमीन के विवाद का नाम दिया जा रहा है। पती के जरिये त्याग किए जाने के बाद एक आदमी ने उसे पनाह दी और आज के युग में भी बेचारी कहे जाने वाली वो महिला पनाह देने वाले व्यक्ति के साथ रहने लगी। उन पांच भाईयों की मांग थी कि महिला मृत पति के पाँचों भाइयों से भी शारीरिक संबंध बनाए, और उनके भाई के जायदाद पर कोई हक ना जताए। शारीरिक संबंध बनाने से इन्कार करने पर उस महिला को निर्वस्त्र करके पीटा गया। इससे बदतर बात तो यह है कि उन्होने इस महिला के मुंह में पेशाब कर उसे पीने पर मजबूर किया। शहर की कामकाजी महिला अपने हक के लिए आवाज उठाती नजर आती है, लेकिन देहात की महिला दाल की तरह पीसी जा रही है कोई ना तो उसकी आवाज सून रहा है ना ही उसे बोलने तक के अधिकार दिये जा रहे हैं। आज भी बेचारगी और लचारगी से जीने को मजबूर है। अमरावती वह इलाका है जहाँ से भारतीय गणतंत्र की राष्ट्रध्यक्षा प्रतिभा पाटिल हैं। उसी अमारवती में एक पारधी समाज की महिला को समाज से बहिष्कृत किया गया क्योंकि एक पुरूष का अनजाने में उसे स्पर्श हुआ था। उस समाज में यह नियम था कि कोई भी दूसरे पुरूष का स्पर्श नही होना चाहिए, अगर हुआ तो उस महिला का बहिष्कार किया जाता है। इसी नियम के तहत उस महिला को बहिष्कृत किया गया। अब राजनीति में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के ऐतिहासिक निर्णय पर राज्यसभा में मुहर लगते ही पूरे देश में खुशी का माहौल बन गया। मानों महिलाओं के अपना हक मिल गया हो। महिलाओं के चेहरे पर खुशी की लहर दौड गयी। चुनाव लडना है या नही ये बात जब होगी तब लेकिन सारी महिलाएँ खुश थी। कहीं मिठाई बंट रही थी तो कहीं गीत संगीत पर थिरकती महिलाएं नजर आ रही थी। वर्षों से खटाई में पडे इस विधेयक को पारित करने में कई सरकारों को कडे विरोध का सामना करना पडा था। ज्यादा से ज्यादा महिला राजनीति में आयेंगी तो देश का भविष्य उज्जवल होगा, भ्रष्ट्राचार पर नकेल कसी जाएगी, महिलांओ पर हो रहे अन्याय , अत्याचार को रोका जाएगा। एक ओर महिलांए आसमान की बुलंदी छुती हैं कल्पना चावला बनकर , तो दूसरी ओर गांव- देहात में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार में इजाफा ही होता जा रहा है। दहेज उत्पीडन के कई मामले आज भी हो रहे है। शराब पीकर आज भी महिलाओं को पीटा जा रहा है। हवस की शिकार होने का सिलसिला अभी भी जारी है। राजनीति में 33 प्रतिशत आरक्षण भी मिल जाएगा उसका फायदा भी होगा और नुकसान भी। कुछ महिलाए तो सचमुच महिलाओं को न्याय दिलवाने में कामयाब होगीं तो कुछ महज कठपुतली बनकर रह जाएगी । लेकिन महिला सुरक्षा का एक एहम मुद्दा जस का तस है। महिलाएं कब अपने आप को सुरक्षित महसूस करेंगी। महिलांओ को आरक्षण के साथ साथ सौ प्रतिशत सुरक्षा की हामी भी देनी होगी तभी जाकर गांव गावं का विकास होकर देश का विकास होगा। कहते हैं शास्त्रों में लिखा है कि यत्र नारियाँ पूजयन्ते तत्र रमन्ते देवा: । शास्त्र सच हो या ना लेकिन ये हकीकत है कि नारियों के सम्मान करने से समृद्धि तो जरूर मिलती है। इस लिए हे मनुज पुत्रों मैं वकालत तो नहीं कर रही हूँ लेकिन जरा आप भी सोचिए क्या ये संभव नहीं है अगर नजरिया बदले तो नारी शक्ति भी उन्नति में भरपूर योगदान कर सकती है।....

Monday, March 1, 2010

स्पेशल चाईल्ड....

कुछ दिन पहले ऑफिस में बैठी थी तभी एक दर्शक का फोन आया उन्होने चॅनल पर एक प्रोग्रॅम देखा जो उनको काफी पसंद आया था। स्पेशल चाईल्ड की जीवनी पर आधारीत वह प्रोग्रॅम था। दो बच्चे ऐसे चुने गये थे जिन्हे हाथ नही है लेकिन पढाई से लेकर हर काम बडी ही आसानी से करते चाहे वो पेंटीग हो या फिर तबला बजाना और तो और यह बच्चे साधारण स्कूल में ही पढते है। हाथ नही होने के बावजूद भी वे खुद अपना सारा काम कर लेते है। उन्हे देखकर तो मुझे भी एक बार लगा की यह तो हमसे भी कई गुना ज्यादा है। हालांकि दस से बारा साल आयु के इन बच्चों को स्पेशल चाईल्ड होने का कोई भी मलाल नही। उनकी इच्छाशक्ती इतनी ज्यादा है की किसीभी परेशानी से जुझने के लिए वे हमेशा तैय्यार रहते है। हमने अपने प्रोग्रॅम के लिए महाराष्ट्र से सिर्फ दो ही बच्चे चुने थे, लेकिन देश में ऐसे कई अनगीनत स्पेशल चाईल्ड है जो रोज परेशानीयों से दो दो हाथ करते है। अपनी अपाहिजता को अपने उज्जवल भविष्य का रोडा नही बनाते। दुसरी ओर पिछले दो- तीन महिनों से पढाई के बोझतले दबे लगभग 40 छात्र छात्राओं ने देशभर में आत्मह्त्या की है। आत्महत्या के पिछे उनकी मानसिकता क्या होगी इसका अंदाजा लगाना तो बेहद मुश्कील है, लेकिन पास में सबकुछ होने के बावजुद मौत को गले लगाना बुजदिली ही कहलाती है। इन स्पेशल चाइल्ड की हिम्मत और कुछ करने का जज्बा देखकर नॉर्मल बच्चों के प्रति गुस्सा आता है, क्यों नही वे इन बच्चों से सिख लेते है, इनका आदर्श सामने रखकर कामयाब होते है। ढूंढने से भगवान भी मिलता है, और इन स्पेशल बच्चों ने भगवान को ढूंढकर कामयाबी पा ली है, तभी तो वे स्पेशल चाइल्ड कहलाते है। कोई भी काम आसान नही होता, मगर नामुमकिन भी नही। इन बच्चों की मिसाल लेकर आम छात्र या लोग प्रेरणा लेगें तो मेहनत और विश्वास के बलबुते कामयाबी जरूर कदम चुमेगी। और जीवन निश्चीत ही खुशहाल होगा।

रिक्शावाले अंकल्स......

मुम्बई में बस या किसी और साधन से सफर करना उतना अच्छा नही लगता जितना की लाइफ लाइन लोकल ट्रेन का सफर इसलिए तो मै रात बारह बजे के बाद भी ऑफिस के ड्रॉपिंग से जाने के बजाए घर तक का सफर ट्रेन से तय करती हूं। हालांकि ट्रेन तो घर तक नही पहुँचाती, सोचती भी हूँ कि काश घर तक ट्रेन पहुँचाती, लिहाजा आठ से दस मीनट के सफर के लिए रिक्शा से जाना लाजमी हो जाता है। रिक्शा के बजाए टैक्सी से रोज रोजाना का सफर हो तो जेब पर भारी पड जाता है, वो ऐसा हो जाएगा की आमदनी अठ्ठनी और खर्चा रूपइय्या। शेअरिंग रिक्शा से जाने के अलावा दुसरा और कोई चारा ही नही होता। रात में घर जाने की जल्दी तो सभी को होती है और मुंबई जैसे शहर में आप ये कतई उम्मीद नही कर सकते की कोई पुरूष आप से कहे कि लेडीज फर्स्ट , कोई यह नही कहेगा कि देर रात हो गयी है और आप अकेली है तो रिक्शा में आप पहले जाए। यहाँ आपधापी इतनी मची है कि अगर कोई रास्ते में गिर जाए तो उसके उपर से कितने सैकडो लोग गुजर जाएगें पता नहीं चलेगा। दिन भर कमरतोड़ मेहनत करके थकने के बाद घर पहुँचने के लिए सभी को मशक्कत करनी पडती है। रात के वक्त रिक्शेवालों की एक अपनी ही अकड होती है । रात में नाईट चार्ज मिलता है तो शेअरिंग से क्यों ले जाए और तो और रात में अगर शेअरिंग रिक्शा ना मिले तो महिलाएं तो कमसे कम मीटर से जरूर जाएंगी । किसी रिक्शेवाले ने गंतव्य स्थान के लिए आवाज लगा दी तो लॉटरी ही लग जाती है। एक दुसरे को कुचलकर लोग अपनी अपनी सीट पाने की होड में लग जाते है। सभी को घर पहुँचने की जल्दी होती है, ऐसे में मै यह उम्मीद भी नही करती की कोई मुझसे यह कहे की मेरे बजाए आप पहले जाए। शहरों में कामकाजी महिलाओं को अक्सर यह अनुभूती होती है। यहां तो महिलाओं की सीट पर बैठे पुरूष उन्हे सीट देने में भी आनाकानी करते है। लेकिन रात के इस दस मीनट के सफर में मुझे एक आशा की किरण भी नजर आती है। रोजमर्रा के इस सफर में मेरे दो रिक्शेवालों से अनजाना से अंकल का रिश्ता बन गया है। एक अंकल रिक्शा चलाते है। दूसरे अंकल से पहचान एक ही समय पर आने से और रिक्शा के इंतजार करते करते हुई है। दोनो भी मेरे दिखने पर मुझे आवाज लगाकर अपनी रिक्शा में बिठा लेते है। जिनकी रिक्शा है वे अंकल पहले मुझे बिठाते है फिर अन्य सवारी को, मै अगर ना रहूं तो किसी अन्य महिला को प्राथमिकता दी जाती है। ना तो उन दोनो को मेरे बारे में कुछ पता है और ना मुझे उनके बारे में, यहां तक की वे मेरा नाम भी नही जानते, यह सिलसिला कई महिनों से शुरू है। एक महिला के प्रति सम्मान देखकर बेहद आश्चर्य होता है। स्वार्थीयों के हुजूम में इन्सानियत अभी भी बरकरार है। रात का सफर अब डरावना नही बल्कि सुहावना लगता है। रात आते ही काले और डरावने बादल नजर आने वाले उस नीली विशाल छतरी की जुम्बिश अभी भी मुझे अपनी ओर खींचती है और कहती है कि भोर भी सुहावना होगा रखो भरोसा... विदा वो इन्सानियत के बन्दे फिर होगी मुलाकात.....।

सचिन रमेश तेडूंलकर.....

सचिन रमेश तेन्दुलकर देश में ही नही बल्कि दुनिया भर के लोगों के दिलों में राज करनेवाला एक ऐसा इंन्सान है जो रोज नई उँचाइयों तक पहुँचने के बाद भी उसके पैर अभी भी जमीन पर ही है। अनगिनत सम्मान, अनगित खिताब पानेवाले सचिन की सादगी के सारे यूँ ही कायल है। सचिन को करीब से जाननेवाले उनकी सादगी, नम्रता, विनय और सामाजिक कार्य से बखूबी वाकिफ है। सचिन को सिर्फ टेलीविजन पर देखनेवाले लोग भी सचिन की सादगी से परीचित है। अनगिनत रेक़ॉर्ड बनानेवाले सचिन को भारतरत्न से सम्मानित करने की सिफारिश महाराष्ट्र सरकार, केंद्र सरकार से करनेवाला है,लेकिन सचिन को यह पुरस्कार देने में स्वंय केंद्र सरकार को ही पहल करनी चाहिए उसके लिए किसी की सिफारिश की जरूरत क्यों आन पडती है। सचिन को सिर्फ टेलीवि़जन पर देखने से ही उनके डाउन टू अर्थ स्वभाव का पता चलता है। हाफ सेंच्युरी हो, सेंच्यूरी या फिर डबल सेंच्यूरी सचिन सबसे पहले अपना बल्ला आकाश की ओर उठाकर भगवान का शुक्रिया अदा करते नजर आते है। अपनी हर एक कामयाबी के लिए अपने परिवार अपने सहयोगी खिलाडियों का शुक्रिया अदा किये बिना उनकी सफलता का क्रेडिट उन्होने आजतक खुद नही लिया। उनकी जगह कोई और होता तो अपनी बैट पटकता या फिर उछलकूद करता। किसी भी विवाद में पडना सचिन को बिल्कुल भी पसंद नही फिर भी उन्हे विवादों में खींचा गया। सचिन ने खामोश रहकर अपने बडप्पन का सबूत दे ही दिया। सचिन के ऐतिहासिक रिकार्ड के बाद देश और दुनिया ने उन्हे सर माथे पर बिठा लिया और उनपर उंगली उठानेवाले की उंगलिया उन्ही की दातों तले दबानेपर मजबूर कर दिया। अब उन्ही लोगों ने सचिन को रेकॉर्ड बनाकर इतिहास रचनेवाले सचिन को विक्रमादित्य करार दिया और उन्हे भारतरत्न से नवाजा जाने की सिफारिश भी की है। क्रिकेट के बारें में मुझे बहुत कुछ जानकारी तो नही है लेकिन सामान्य ज्ञान जरूर है। पिछले कुछ दिन पहले सचिन का फॉर्म खराब होने की चर्चा थी, और उन्हे सन्यास लेना चाहिए ऐसी अफवाएँ भी उडने लगी थी, लेकिन सचिन ने नाही इस बात का बुरा माना या कोई टिप्पणी की। अपने बीस साल के करियर में बुलंदी छुनेवाले सचिन ने कभीभी अहम को अपने आस पास भटकने नही दिया। टेनिस एल्बो की शिकायत के बाद भी वो आज भी पाँच पाँच घंटो तक प्रैक्टीस करते है। सचिन के वन डे में 200 रन का इतिहास रचने के बाद महानतम खिलाडियों ने उनकी प्रशंसा में कसीदे पढे है। उन्हें भगवान तक बना दिया। चाहे वो ऑस्ट्रेलियन खिलाडी हो या फिर पाकीस्तानी। शोएब अख्तर ने कहा है की सचिन गेंदबाजो के दुश्मन नही बल्कि गेंद के दुश्मन होते है और वे इस दुश्मनी को बखुबी निभाते भी है। उनकी सफलता, नम्रता देखकर सामान्य व्यक्ति नतमस्तक हो जाए तो कोई अचरज नही होगा। एक महानतम खिलाडी होने के साथ साथ सचिन एक आदर्श बेटा, आदर्श भाई, आदर्श पति के साथ साथ आदर्श पिता भी है। अपने पिता और भाई से मिली सीख को वे अपने बच्चों को भी दे रहे है साथ ही वे अपने बच्चों के जरिये दिए गए सुझावों पर भी अमल करते है। पूरी दुनिया से भर भर कर प्यार पानेवाले सचिन ने अनाथालय के बच्चों में भर भर कर प्यार, खुशियां बांटी है। अनाथालय में प्यार बांटकर समाज का ऋण भी वे चुका रहे है। विक्रमादित्य, क्रिकेट का शहंशाह, क्रिकेट का भगवान कह लो या फिर सचिन को कोई भी खिताब से नवाजा जाए फिर भी यह अनमोल रत्न अपनी सादगी कभी नही छोडेगा। सफलता के शिखर पर खडे रहने के बाद भी इस महान खिलाडी के पैर जमीन पर होने से उनके सामने अपने आप ही सर झुक जाता है।