Monday, April 5, 2010

रास ना आयी जिंदगी............

केवल ढाई अक्षरों में संसार समा सकता है और वो है “प्रेम”। इसमें जो डूबा वो संसार को पा सकता है लेकिन शर्त ये है कि वो नि:स्वार्थ हो। अक्सर ये होता भी नि:स्वार्थ ही। लेकिन इस पर नजर लग जाती है समाज और घर परिवार के लोगों की ही। दिल्ली में रविवार का दिन दो प्रेमी जोडे का आखरी दिन साबित हुआ। जोडे ने प्यार किया लेकिन उसके प्यार को कबूला नहीं समाज और घर ने। लिहाजा 22- से 25 उम्र के इन दो प्रेमी जोडो ने उपनी जीवनयात्रा को विराम दे दिया। एक जोडे ने ट्रेन के सामने आकर अपने प्यार को मरते मरते गले लगा लिया तो दूसरे जोडे ने पुल से नीचे कुदकर साथ साथ मरने की कसम को ही पूरा कर लिया। चाँद तो छोडिए हम मंगल पर पहुँच गए हैं साल बीतते 2010 तक हम पहुँच चुके है लेकिन समाज में आज भी प्यार को हेय नजर से देखा जाता है। जैसे प्यार ना हो कोई बदबूदार पदार्थ हो और महमारी फैलाने वाली बीमारी हो, पांव तले रौदने से में कोई हिचकता तक नहीं। उंची और नीत जात, गरीब और अमीर का भेद आज भी बरकरार है, चाहे हम विश्व की उत्पत्ती का खोज लगा ले या फिर मंगल पर जीवन को खोज आए। प्यार कभी भी किसी ने ये सोच कर नहीं किया कि उनके प्यार का अंजाम क्या होगा। जीवन में कभी वो मिल भी पाएँगे या नहीं ये कोई नहीं सोचता ना ही कभी ये सोचते कि सामने से प्यार का तोहफा देने वाली उँची जाति का , नीची जात का है, गरीब है या किसी रईसजादे की संतान है। प्रेमी आपस में एक झलक निहारने के साथ प्यार के बदले केवल प्यार का ही व्यवहार रखते हैं, इसके अलावा ना ही कोई इच्छा होती ना कोई कामना बस प्यार ही प्यार। उनकी कतई यह इच्छा नही होती कि उनके चलते किसी को कष्ट हो,कभी भी परिवार में भूचाल आए। अगर प्यार को पूजा की तरह देखे तो परिवार में ऐसा कभी होगा भी नहीं। लेकिन पूजा कौन भगवान की मूर्ति पर पडे मैल की तरह देखते हैं लोग। मैं कहती हूँ कि जात और पात की दुहाई देने वाले लोग ये बताए कि क्या जाति आपके चेहरे पर लिखा होता है। ना ही आपके चेहरे पर किसी जाति का चिन्ह है और ना ही आपके सही तरीके के रहन सहन से पता चलता है। रही बात धर्म का तो पता चल सकता है लेकिन ये बताएये किस धर्म में लिखा है कि लोगों से नफरत करों प्यार के बदले किसी का जीवन ही छीन लो। एक कागज का वो पूर्जा नफरत का कारण बन जाता है जिसपर आपके जाति का पर्माण पत्र होता है। सदियों पहले जब वर्ण व्यवस्था नहीं थी उस समय क्यों नहीं जाति प्रथा थी। उपनिषदो में साफ लिखा है कि अगर आपके कुल में कोई नीच कुल से भी लडकी आती और अगर उसके व्यवहार आपके कुल से श्रेठ है तो वो आपके लिए आदरणीय है। इसे स्वीकार करना शास्त्र धर्म है। प्यार वो अनुभति है जो हल्की सर्दी में नम घास पर ओस की बूँद से भी रुमानी। अगर महसूस करें तो पैरों से लेकर अंतरआत्मा को तृप्त कर देती है। इसे पाने के बाद, जीने का वजूद मिल जाता है, जोश से प्रेमी जोडे सराबोर हेता है। वे अपने जीवन की छोटी सी छोटी खुशी को बडे ही प्यार से संजोए रखते है। आपसे में गम बाटंकर अपने दुखो के बोझ को हल्का कर लेते है। लेकिन समाज में प्यार का विरोध ना हो यह बात कभी हो ही नही सकती। जब प्यार किया तो डरना क्या, प्यार किया कोई चोरी नही की, ये हमें फिल्मों में ही अच्छा लगता है क्योंकि हर प्रेमी जोडे को प्यार होने के बाद डरना ही पडता है, भले ही वो आपस में प्यार बांटने का नेक काम ही क्यों न करते है। दो प्रेमियों के आपस में एक होने से समाज का क्या बुरा होनेवाला है, या फिर परिवार का। बच्चों के प्यार को परिवार के सहारे के जरूरत है, उनके प्यार के बेसहारा होने से बच्चे तो घुट-घुट कर मरते ही जीना पर भी कई चीजे सालते रहता है। जिन्दा तो रहते हैं लेकिन बुझे-बुझे मजबूरी हो जाती है। इन्हें साथ रहने दीजिए क्योकि साथ रहने की कसमें खाने वाले कब साथ मे मर जाए कोई नहीं जानता। उत्तर भारत में प्रेमीयों के विरोध की धार बहुत ही तेज है, जो हिम्मत करके अपने प्यार को चुनते है उनके लिए सजा का फर्मान निकलता है। एक सप्ताह पहले शादी करनेवाले जोडे की आंखे निकालने का तुगलकी फर्मान निकाला गया। हम स्वतंत्र देश में रहते है ना किसी गुलाम देश में जहाँ अवाज उठाने पर ही कत्ल का फरमान दे दिया जाता है। गुजारिश है उस परिवार से जो बच्चों को अपनी झूठी शान के लिए बलि चढा देते हैं , कम से इस कदर ना तो अपनी खुशी बरबाद करे और ना ही बच्चों की। भावनाओं की आग में झुलसाइए नहीं। जीते जी उनकी चिता में अग्नि ना दिया करें। मत छीनों उन परिन्दों का जीवन जो तुम्हारी जीवन के लिए ही अपनी जीवन की आहुति देने को तैयार हैं। क्या कहूँ मजबूरी है.... कुछ आप भी सोंचे ,क्या जो समाज में हो रहा है ठीक है।

Friday, March 19, 2010

महिलाओं के साथ दोतरफा व्यवहार....

9 मार्च 2010 का दिन भारतीय गणतंत्र में इतिहास के पन्नों में दर्ज होने के लिए गर्व से तैयार है। इस दिन राज्यसभा में एक ऐसा प्रस्ताव पारित किया गया जिसका जिक्र अब ऐतिहासिक घटना के रूप में होगा। देशभर की महिलाओं को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का तोहफा मिल गया । इन इतिहास की बातों से हर किसी का सीना गर्व से फूल गया है। महिलाएँ उत्साह और उमंग से लबेरेज हैं, अपनी जीत पर फूली नहीं समा रही हैं। हक और अधिकार मिलने का जज्बा दिल में था। बुलंदी छूने की भावना जगी थी। दुनिया को नापने और जीतने की उमंग जगी थी। अत्याचार के खिलाफ कमर कसने की तैयारी हो रही थी। लेकिन एक बात मैं जो कहने जा रही हूँ वो शायद कम ही लोगों को पता होगा, 10 मार्च को महाराष्ट्र के बीड जिले के एक गावं में एक महिला के साथ शर्मनाक हादसा हुआ। जिसको देखकर यही कहा जा सकता है कि सारे अधिकार केवल कागजों पर ही है। एक महिला को निर्वस्त्र करके सरेआम पीटा गया। शायद ये वाकया पहली बार नही हुआ होगा। इससे पहले भी महिलाओं के साथ ऐसी दर्दनाक घटनाएँ घटी है। बीड की इस महिला को पाचं भाईयों ने निर्वस्त्र करके पीटा, उसके पीछे का कारण कुछ अलग है, हालांकि इसे अब जमीन के विवाद का नाम दिया जा रहा है। पती के जरिये त्याग किए जाने के बाद एक आदमी ने उसे पनाह दी और आज के युग में भी बेचारी कहे जाने वाली वो महिला पनाह देने वाले व्यक्ति के साथ रहने लगी। उन पांच भाईयों की मांग थी कि महिला मृत पति के पाँचों भाइयों से भी शारीरिक संबंध बनाए, और उनके भाई के जायदाद पर कोई हक ना जताए। शारीरिक संबंध बनाने से इन्कार करने पर उस महिला को निर्वस्त्र करके पीटा गया। इससे बदतर बात तो यह है कि उन्होने इस महिला के मुंह में पेशाब कर उसे पीने पर मजबूर किया। शहर की कामकाजी महिला अपने हक के लिए आवाज उठाती नजर आती है, लेकिन देहात की महिला दाल की तरह पीसी जा रही है कोई ना तो उसकी आवाज सून रहा है ना ही उसे बोलने तक के अधिकार दिये जा रहे हैं। आज भी बेचारगी और लचारगी से जीने को मजबूर है। अमरावती वह इलाका है जहाँ से भारतीय गणतंत्र की राष्ट्रध्यक्षा प्रतिभा पाटिल हैं। उसी अमारवती में एक पारधी समाज की महिला को समाज से बहिष्कृत किया गया क्योंकि एक पुरूष का अनजाने में उसे स्पर्श हुआ था। उस समाज में यह नियम था कि कोई भी दूसरे पुरूष का स्पर्श नही होना चाहिए, अगर हुआ तो उस महिला का बहिष्कार किया जाता है। इसी नियम के तहत उस महिला को बहिष्कृत किया गया। अब राजनीति में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के ऐतिहासिक निर्णय पर राज्यसभा में मुहर लगते ही पूरे देश में खुशी का माहौल बन गया। मानों महिलाओं के अपना हक मिल गया हो। महिलाओं के चेहरे पर खुशी की लहर दौड गयी। चुनाव लडना है या नही ये बात जब होगी तब लेकिन सारी महिलाएँ खुश थी। कहीं मिठाई बंट रही थी तो कहीं गीत संगीत पर थिरकती महिलाएं नजर आ रही थी। वर्षों से खटाई में पडे इस विधेयक को पारित करने में कई सरकारों को कडे विरोध का सामना करना पडा था। ज्यादा से ज्यादा महिला राजनीति में आयेंगी तो देश का भविष्य उज्जवल होगा, भ्रष्ट्राचार पर नकेल कसी जाएगी, महिलांओ पर हो रहे अन्याय , अत्याचार को रोका जाएगा। एक ओर महिलांए आसमान की बुलंदी छुती हैं कल्पना चावला बनकर , तो दूसरी ओर गांव- देहात में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार में इजाफा ही होता जा रहा है। दहेज उत्पीडन के कई मामले आज भी हो रहे है। शराब पीकर आज भी महिलाओं को पीटा जा रहा है। हवस की शिकार होने का सिलसिला अभी भी जारी है। राजनीति में 33 प्रतिशत आरक्षण भी मिल जाएगा उसका फायदा भी होगा और नुकसान भी। कुछ महिलाए तो सचमुच महिलाओं को न्याय दिलवाने में कामयाब होगीं तो कुछ महज कठपुतली बनकर रह जाएगी । लेकिन महिला सुरक्षा का एक एहम मुद्दा जस का तस है। महिलाएं कब अपने आप को सुरक्षित महसूस करेंगी। महिलांओ को आरक्षण के साथ साथ सौ प्रतिशत सुरक्षा की हामी भी देनी होगी तभी जाकर गांव गावं का विकास होकर देश का विकास होगा। कहते हैं शास्त्रों में लिखा है कि यत्र नारियाँ पूजयन्ते तत्र रमन्ते देवा: । शास्त्र सच हो या ना लेकिन ये हकीकत है कि नारियों के सम्मान करने से समृद्धि तो जरूर मिलती है। इस लिए हे मनुज पुत्रों मैं वकालत तो नहीं कर रही हूँ लेकिन जरा आप भी सोचिए क्या ये संभव नहीं है अगर नजरिया बदले तो नारी शक्ति भी उन्नति में भरपूर योगदान कर सकती है।....

Monday, March 1, 2010

स्पेशल चाईल्ड....

कुछ दिन पहले ऑफिस में बैठी थी तभी एक दर्शक का फोन आया उन्होने चॅनल पर एक प्रोग्रॅम देखा जो उनको काफी पसंद आया था। स्पेशल चाईल्ड की जीवनी पर आधारीत वह प्रोग्रॅम था। दो बच्चे ऐसे चुने गये थे जिन्हे हाथ नही है लेकिन पढाई से लेकर हर काम बडी ही आसानी से करते चाहे वो पेंटीग हो या फिर तबला बजाना और तो और यह बच्चे साधारण स्कूल में ही पढते है। हाथ नही होने के बावजूद भी वे खुद अपना सारा काम कर लेते है। उन्हे देखकर तो मुझे भी एक बार लगा की यह तो हमसे भी कई गुना ज्यादा है। हालांकि दस से बारा साल आयु के इन बच्चों को स्पेशल चाईल्ड होने का कोई भी मलाल नही। उनकी इच्छाशक्ती इतनी ज्यादा है की किसीभी परेशानी से जुझने के लिए वे हमेशा तैय्यार रहते है। हमने अपने प्रोग्रॅम के लिए महाराष्ट्र से सिर्फ दो ही बच्चे चुने थे, लेकिन देश में ऐसे कई अनगीनत स्पेशल चाईल्ड है जो रोज परेशानीयों से दो दो हाथ करते है। अपनी अपाहिजता को अपने उज्जवल भविष्य का रोडा नही बनाते। दुसरी ओर पिछले दो- तीन महिनों से पढाई के बोझतले दबे लगभग 40 छात्र छात्राओं ने देशभर में आत्मह्त्या की है। आत्महत्या के पिछे उनकी मानसिकता क्या होगी इसका अंदाजा लगाना तो बेहद मुश्कील है, लेकिन पास में सबकुछ होने के बावजुद मौत को गले लगाना बुजदिली ही कहलाती है। इन स्पेशल चाइल्ड की हिम्मत और कुछ करने का जज्बा देखकर नॉर्मल बच्चों के प्रति गुस्सा आता है, क्यों नही वे इन बच्चों से सिख लेते है, इनका आदर्श सामने रखकर कामयाब होते है। ढूंढने से भगवान भी मिलता है, और इन स्पेशल बच्चों ने भगवान को ढूंढकर कामयाबी पा ली है, तभी तो वे स्पेशल चाइल्ड कहलाते है। कोई भी काम आसान नही होता, मगर नामुमकिन भी नही। इन बच्चों की मिसाल लेकर आम छात्र या लोग प्रेरणा लेगें तो मेहनत और विश्वास के बलबुते कामयाबी जरूर कदम चुमेगी। और जीवन निश्चीत ही खुशहाल होगा।

रिक्शावाले अंकल्स......

मुम्बई में बस या किसी और साधन से सफर करना उतना अच्छा नही लगता जितना की लाइफ लाइन लोकल ट्रेन का सफर इसलिए तो मै रात बारह बजे के बाद भी ऑफिस के ड्रॉपिंग से जाने के बजाए घर तक का सफर ट्रेन से तय करती हूं। हालांकि ट्रेन तो घर तक नही पहुँचाती, सोचती भी हूँ कि काश घर तक ट्रेन पहुँचाती, लिहाजा आठ से दस मीनट के सफर के लिए रिक्शा से जाना लाजमी हो जाता है। रिक्शा के बजाए टैक्सी से रोज रोजाना का सफर हो तो जेब पर भारी पड जाता है, वो ऐसा हो जाएगा की आमदनी अठ्ठनी और खर्चा रूपइय्या। शेअरिंग रिक्शा से जाने के अलावा दुसरा और कोई चारा ही नही होता। रात में घर जाने की जल्दी तो सभी को होती है और मुंबई जैसे शहर में आप ये कतई उम्मीद नही कर सकते की कोई पुरूष आप से कहे कि लेडीज फर्स्ट , कोई यह नही कहेगा कि देर रात हो गयी है और आप अकेली है तो रिक्शा में आप पहले जाए। यहाँ आपधापी इतनी मची है कि अगर कोई रास्ते में गिर जाए तो उसके उपर से कितने सैकडो लोग गुजर जाएगें पता नहीं चलेगा। दिन भर कमरतोड़ मेहनत करके थकने के बाद घर पहुँचने के लिए सभी को मशक्कत करनी पडती है। रात के वक्त रिक्शेवालों की एक अपनी ही अकड होती है । रात में नाईट चार्ज मिलता है तो शेअरिंग से क्यों ले जाए और तो और रात में अगर शेअरिंग रिक्शा ना मिले तो महिलाएं तो कमसे कम मीटर से जरूर जाएंगी । किसी रिक्शेवाले ने गंतव्य स्थान के लिए आवाज लगा दी तो लॉटरी ही लग जाती है। एक दुसरे को कुचलकर लोग अपनी अपनी सीट पाने की होड में लग जाते है। सभी को घर पहुँचने की जल्दी होती है, ऐसे में मै यह उम्मीद भी नही करती की कोई मुझसे यह कहे की मेरे बजाए आप पहले जाए। शहरों में कामकाजी महिलाओं को अक्सर यह अनुभूती होती है। यहां तो महिलाओं की सीट पर बैठे पुरूष उन्हे सीट देने में भी आनाकानी करते है। लेकिन रात के इस दस मीनट के सफर में मुझे एक आशा की किरण भी नजर आती है। रोजमर्रा के इस सफर में मेरे दो रिक्शेवालों से अनजाना से अंकल का रिश्ता बन गया है। एक अंकल रिक्शा चलाते है। दूसरे अंकल से पहचान एक ही समय पर आने से और रिक्शा के इंतजार करते करते हुई है। दोनो भी मेरे दिखने पर मुझे आवाज लगाकर अपनी रिक्शा में बिठा लेते है। जिनकी रिक्शा है वे अंकल पहले मुझे बिठाते है फिर अन्य सवारी को, मै अगर ना रहूं तो किसी अन्य महिला को प्राथमिकता दी जाती है। ना तो उन दोनो को मेरे बारे में कुछ पता है और ना मुझे उनके बारे में, यहां तक की वे मेरा नाम भी नही जानते, यह सिलसिला कई महिनों से शुरू है। एक महिला के प्रति सम्मान देखकर बेहद आश्चर्य होता है। स्वार्थीयों के हुजूम में इन्सानियत अभी भी बरकरार है। रात का सफर अब डरावना नही बल्कि सुहावना लगता है। रात आते ही काले और डरावने बादल नजर आने वाले उस नीली विशाल छतरी की जुम्बिश अभी भी मुझे अपनी ओर खींचती है और कहती है कि भोर भी सुहावना होगा रखो भरोसा... विदा वो इन्सानियत के बन्दे फिर होगी मुलाकात.....।

सचिन रमेश तेडूंलकर.....

सचिन रमेश तेन्दुलकर देश में ही नही बल्कि दुनिया भर के लोगों के दिलों में राज करनेवाला एक ऐसा इंन्सान है जो रोज नई उँचाइयों तक पहुँचने के बाद भी उसके पैर अभी भी जमीन पर ही है। अनगिनत सम्मान, अनगित खिताब पानेवाले सचिन की सादगी के सारे यूँ ही कायल है। सचिन को करीब से जाननेवाले उनकी सादगी, नम्रता, विनय और सामाजिक कार्य से बखूबी वाकिफ है। सचिन को सिर्फ टेलीविजन पर देखनेवाले लोग भी सचिन की सादगी से परीचित है। अनगिनत रेक़ॉर्ड बनानेवाले सचिन को भारतरत्न से सम्मानित करने की सिफारिश महाराष्ट्र सरकार, केंद्र सरकार से करनेवाला है,लेकिन सचिन को यह पुरस्कार देने में स्वंय केंद्र सरकार को ही पहल करनी चाहिए उसके लिए किसी की सिफारिश की जरूरत क्यों आन पडती है। सचिन को सिर्फ टेलीवि़जन पर देखने से ही उनके डाउन टू अर्थ स्वभाव का पता चलता है। हाफ सेंच्युरी हो, सेंच्यूरी या फिर डबल सेंच्यूरी सचिन सबसे पहले अपना बल्ला आकाश की ओर उठाकर भगवान का शुक्रिया अदा करते नजर आते है। अपनी हर एक कामयाबी के लिए अपने परिवार अपने सहयोगी खिलाडियों का शुक्रिया अदा किये बिना उनकी सफलता का क्रेडिट उन्होने आजतक खुद नही लिया। उनकी जगह कोई और होता तो अपनी बैट पटकता या फिर उछलकूद करता। किसी भी विवाद में पडना सचिन को बिल्कुल भी पसंद नही फिर भी उन्हे विवादों में खींचा गया। सचिन ने खामोश रहकर अपने बडप्पन का सबूत दे ही दिया। सचिन के ऐतिहासिक रिकार्ड के बाद देश और दुनिया ने उन्हे सर माथे पर बिठा लिया और उनपर उंगली उठानेवाले की उंगलिया उन्ही की दातों तले दबानेपर मजबूर कर दिया। अब उन्ही लोगों ने सचिन को रेकॉर्ड बनाकर इतिहास रचनेवाले सचिन को विक्रमादित्य करार दिया और उन्हे भारतरत्न से नवाजा जाने की सिफारिश भी की है। क्रिकेट के बारें में मुझे बहुत कुछ जानकारी तो नही है लेकिन सामान्य ज्ञान जरूर है। पिछले कुछ दिन पहले सचिन का फॉर्म खराब होने की चर्चा थी, और उन्हे सन्यास लेना चाहिए ऐसी अफवाएँ भी उडने लगी थी, लेकिन सचिन ने नाही इस बात का बुरा माना या कोई टिप्पणी की। अपने बीस साल के करियर में बुलंदी छुनेवाले सचिन ने कभीभी अहम को अपने आस पास भटकने नही दिया। टेनिस एल्बो की शिकायत के बाद भी वो आज भी पाँच पाँच घंटो तक प्रैक्टीस करते है। सचिन के वन डे में 200 रन का इतिहास रचने के बाद महानतम खिलाडियों ने उनकी प्रशंसा में कसीदे पढे है। उन्हें भगवान तक बना दिया। चाहे वो ऑस्ट्रेलियन खिलाडी हो या फिर पाकीस्तानी। शोएब अख्तर ने कहा है की सचिन गेंदबाजो के दुश्मन नही बल्कि गेंद के दुश्मन होते है और वे इस दुश्मनी को बखुबी निभाते भी है। उनकी सफलता, नम्रता देखकर सामान्य व्यक्ति नतमस्तक हो जाए तो कोई अचरज नही होगा। एक महानतम खिलाडी होने के साथ साथ सचिन एक आदर्श बेटा, आदर्श भाई, आदर्श पति के साथ साथ आदर्श पिता भी है। अपने पिता और भाई से मिली सीख को वे अपने बच्चों को भी दे रहे है साथ ही वे अपने बच्चों के जरिये दिए गए सुझावों पर भी अमल करते है। पूरी दुनिया से भर भर कर प्यार पानेवाले सचिन ने अनाथालय के बच्चों में भर भर कर प्यार, खुशियां बांटी है। अनाथालय में प्यार बांटकर समाज का ऋण भी वे चुका रहे है। विक्रमादित्य, क्रिकेट का शहंशाह, क्रिकेट का भगवान कह लो या फिर सचिन को कोई भी खिताब से नवाजा जाए फिर भी यह अनमोल रत्न अपनी सादगी कभी नही छोडेगा। सफलता के शिखर पर खडे रहने के बाद भी इस महान खिलाडी के पैर जमीन पर होने से उनके सामने अपने आप ही सर झुक जाता है।

Tuesday, February 9, 2010

शेर हैं कि बिल्ली...?

राहुल गांधी को काले झंडे दिखाने का आदेश शिवसेना सुप्रिमों बाल ठाकरे ने दिया और उनके आदेश को सर माथे पर लेकर शिवसैनिक गली कुंचे से निकलकर काले झंडे दिखाने के लिए कुछ हद तक सामने भी आए लेकिन बाईस हजार पुलिस कर्मीयों ने उनके प्लॉन को फेल कर दिया, उनके आंदोलन की हवा ही निकाल डाली। साथ ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने रास्ते पर उतर कर उनका सामना करने के लिए कमर कस ली।शायद ये नजारा मुंबई हमले के वक्त देखने मिलता तो आज नजारा ही कुछ और होता ना कि मुंबई पुलिस के जाबांज शहीद होते और ना ही एन.एस.जी के कमांडो जिन्हे मुंबई के लिए निकलने की आज्ञा हमले के दस घंटे बाद दी गयी। राहुल गांधी के मुंबई के सफल दौरे के बाद कार्यकारी अध्यक्ष ने आनन फानन में प्रेस कॉन्फ्रेस लेकर ये साबित कर दिया की राहुल गांधी को उनके वजह से हवाई यात्रा छोडकर रेल का सफर तय करना पडा हालांकि सच्चाई सभी को पता है। शाहरूख खान के बयान पर शिवसेना ने आक्रमक रूख अख्तियार तो कर लिया लेकिन विरोध फिल्म की करे या शाहरूख की इस भ्रम में शिवसेना खुद ही अपने बुने जाल में फँस गयी । हालांकि खेल और कला को इस विवाद में लाना समझदारी नही था। लेकिन मुंबई आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तानी साजिश से सारा देश आहत हुआ है, ऐसें में पाकिस्तान खिलाडियों को आईपीएल में खिलाने का विरोध शिवसेना ने जताया। राज्यसरकार ने शाहरूख को सुरक्षा देने का वादा किया। मुंबई लौटकर शाहरूख ने बालासाहब से मिलने का इच्छा भी जाहीर की और अपने बयान पर कायम रहे। शिवसेना का यह मिशन भी फेल हो गया। ऑस्ट्रेलिया में भारतीयो पर हो रहे नस्लवाद के हमले की वजह से कई भारतीय छात्रों पर जान पर बन आयी है। हमले अभी भी बरकरार है, केंद्र सरकार ऑस्ट्रेलियन सरकार से चर्चा करके भारतीयों पर हो रहे हमले को रोकने की कोशीश में है। आश्चर्य तब और होता है कि जब आस्ट्रेलियाई सरकार ने भारतीय छात्रों को गरीबी दर्शाने की नसीहत दे डाली। स्थानीय ऑस्ट्रेलियन भारतीयों के आने से असुरक्षित तो कम जलन और अपनी काहिलपन को छुपाने के लिए हमले करने लगे हैं। शिवसेना ने इस बात का विरोध जताते हुए ऑस्ट्रेलियन खिलाडियों को मुंबई में आने से विरोध जताया है। लेकिन केंद्रीय कृषीमंत्री श्री शरद पवार बीच बचाव करने आगे आये है। शिवसेना प्रमुख से चर्चा करके इस बात पर हल निकालने की पहल की ही। देश में मंहगाई बढती जा रही है, शक्कर की मिठास मुंह से निकल गयी हा वहीं राष्ट्रवादी के पत्रिका में यह कहा गया है कि शक्कर नही खाने से कोई मर नही जाएगा। इस पर मंत्रालय के साथ सरकार से जुडे लोगों को शर्म आनी चाहिए। डब साबुन का और शक्कर का दाम एक जैसा है, लेकिन उसके बारे में कोई आवाज नही उठाते। राष्ट्रवादी को यह शायद पता होगा की दो वक्त की रोटी का जुगाड करनेवाला इंसान डब साबुन या इत्त्तर का इस्तेमाल नही करता। चाय में शक्कर की मिठास तो जाती रही अब रंग भी फिका हो गया। लेकिन खेल से सभी को प्यार है चाहे वो ऑस्ट्रेलियन खिलाडी हो या पाकिस्तानी सभी को पसंद किया जाता है। पवार जी ने कल महाराष्ट्र के औरंगाबाद में कहा था कि अब बालासाहब की उम्र हो चुकी है, विरोध करके क्या करेंगें बच्चों को खेलने दीजिए, मै उनसे मिलकर उनको समझाउंगा। चर्चा के बाद अब शिवसेना यह तय करेगी की खिलाडियों को विरोध करना है या नही। यह आंदोलन भी खटाई में जाता रहा। क्या शिवसेना का पावर कम हो रहा है, या मराठी –गैर मराठी के विवाद का विभाजन ठाकरे परिवार में हो रहे विभाजन की वजह से मराठी मानुष दुविधा में है कि शिवसेना की राह पर चले या मनसे का हाथ थामे। कौन दिलवाएगा भूमिपुत्रों को न्याय। भूमिपुत्रों को न्याय दिलवाने के लिए साठ साल पहले जो शिवसेना शेर की तरह दहाडा करती थी अब वो मिमियाने लगी है। बॅकफूट पर जाने लगी है। बालासाहब ठाकरे की फिर से एन्ट्री से अगर मुंबई महापालिका चुनाव मे शिवसेना फिर से बाजी मार लेती है तो क्या फिरसे उन्हे सक्रिय राजनिती में उतरकर दहाडना होगा। शिवसेना का वजूद दिखाना होगा।..... लेकिन फिलहाल तो सेना शेर की जगह बिल्ली बनी हुई है।

जहांपना तुस्सी ग्रेट हो....

कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी मुंबई आए, आने से पहले मिली हर चुनौती और चेतावनी का सामना करते हुए मुंबई का दौरा सफल करके दिखा भी दिया। शिवसेना के आंदोलन की हवा निकालते हुए उन्होने यह साबित कर दिया कि मुंबई सभी की है, हर भारतीय मुंबई ही नही बल्कि देश में कहीं भी आ जा सकता है। युवराज देश के भविष्य ही नही बल्कि वर्तमान भी है, हर चुनौती का सामना बडे ही सादगी से करके हर भारतीय नौजवान ही नही बल्कि बुजुर्गो के गले की शोभा के रुप में ताबिज बन चुके है। राहुल गांघी की सादगी और जमीन से जुडे रहने की वजह से सभी उनके कायल है। सबसे अहम बात तो यह है कि दलितों के साथ हो रहे भेदभाव को उन्होने काफी हदतक मिटाने की कोशीश की है। अब तो लगता है कि हर नौजवान युवराज के नक्शे कदम पर चलना चाहता होगा, उनकी तरह सोचने, करने की कोशिश करना चाहता होगा। लेकिन इस मुंबई दौरे का एक दूसरा पहलू भी सामने आया है जो सोचने पर मजबूर भी करता है। राहुल गांघी ने बिहार के लोगों के सामने यह कहकर उनका दिल जीत लिया की मुंबई हमले के दौरान यू.पी –बिहार से आए एन एस.जी कमांडो ने मुंबईकरों को आतंकीयों से बचाया है। राहुल गांधी को कल का नेतृत्व करना है, सभी के दिलों में उनके लिए काफी इज्जत है, लेकिन उनके इस बयान से शायद देश के जवानों में भी मराठी – गैर मराठी की भावना ना पैदा हो जाए। आम मुंबईकरों को या महाराष्ट्रीयन लोगों के मन में ये कतई भेदभाव नही है। राजनीतिक पार्टीयों ने मराठी गैर मराठीयों का विवाद खडा कर दिया है। विवाद खडा करने में सबसे अहम भुमिका निभा रही है मिडीया। बाल की खाल निकालकर, बयानों को बढा चढाकर,तोड मरोडकर पेश किया जा रहा है। लोगों में गलत संदेश दे रहे है। कल की ही बात ले लिजिए राहुल गांधी का रेल सफर...., मुंबई दौरा कामयाब होने के बाद मिडीया ने बाल ठाकरे, राज ठाकरे, उध्दव ठाकरे को मुहं चिढाना शुरू कर दिया, उन्हे उकसाने में कोई कसर नहीं छोडी। राहुल गांधी आम आदमी से जुडे रहने की कोशिश में रहते है, देश का भविष्य पढे लिखे काबिल नौजवानों के हाथों सौपना चाहते है। भारतभर में घूम कर नौजवानों में नया जोश पैदा कर रहे है। मुबंई दौरे के वक्त राहूल गांधी ने हवाई यात्रा छोडकर आम आदमी के साथ जाना पसंद किया ये बात काफी अच्छी लगी , उन्होने रेल यात्रियों के परेशानियों के बारे में भी पूछा। सभी लोग राहुल गांधी को देखने के लिए , उनसे हाथ मिलाने के लिए काफी उत्साहित भी थे। कमांडो के घेरे में रहने के बावजूद भी वे आम आदमी से रूबरू हुए। शिवसैनिक जहां काले झडें दिखा रहे थे वहां आम मुंबईकर चाहे वे मराठी हो या गैर मराठी सभी ने राहुल गांधी का स्वागत किया। लेकिन राहुल गांधी की दो बातें मुझे तो बिल्कुल भी अच्छी नही लगी। राहुल गांधी न अंधेरी से दादर और दादर से घाटकोपर तक का सफर रेल से तय किया उस बात का स्वागत है। लेकिन टिकट के कतार में खडे रहकर टिकट लेना और एटीएम से पैसे निकालना ये बात कुछ रास नही आयी। भले ही उन्होने ये साबित करने की कोशिश की हो, कि मै भी आप लोगों में से एक हूं। आम मुंबईकर की परेशानी कुछ अलग है, उसके पास यह सोचने के लिए वक्त नही की मराठी गैर मराठी के विवाद में शामिल हो या नही। मुंबईकर की दिन की शुरूवात भागते दौडते होती है और समाप्ति भी। समय पर ट्रेन या बस लेकर अपने गंतव्य स्थान पर पहुचने के लिए उसे कितनी जद्दोजहद करनी पडती है यह पीडा मुंबईकरों के अलावा कोई नही जान सकता। आबादी बढ रही है लेकिन खाने पीने की चीजे, आवाजाही के साधन रहने की जगह कम होती जा रही है। चीजों के दाम केवल बढते जा रहे है उत्पादन नहीं। हर इंसान मुंबई को केवल पैसे कमाने का जरीया समझने लगा है, बस आओ और पैसा कमाओ। लेकिन सुंदर मुंबई स्वच्छ मुंबई का नक्शा घिनौना होता जा रहा है, रहने के लिए कहीं पर भी झुग्गियां बनती जा रही है। क्या पालिका प्रशासन को इस बात का पता नही चलता की अवैध झुग्गियों का निर्माण हो रहा है। सबकुछ पता रहता है, लेकिन स्थानीय पार्षदों को झुग्गी के दादाओं से रिश्वत जो मिलती है और फिर सरकार को भी तो वोट चाहिए तो झुग्गियों को सुरक्षा देना लाजमी होता जा रहा है। जगहों के बढते दामों ने आम आदमी के घर के सपने को तोडा ही नही बल्कि चकनाचूर कर दिया है, मुंबई का मिल मजदूर शहर से बाहर हो गया है। कई मिल बंद हो चुकी है और तो कईयों को आग के हवाले कर दिया है। मिल मजदूरों के बच्चे आज या तो क्रिमीनल बन गये है, या तो कहीं दिहाडी मजदूर बनने पर मजबूर है। बरसों से उनको मिल रहा है तो केवल आश्वासन मिल की जगह घर और बच्चों को नौकरी। सालों बीत गये अब और कितने साल बीताने होंगे शायद भगवान ही जाने। देश सभी का है किसी को भी कहीं भी जाने का अधिकार है, कमाने खाने का अधिकार है, लेकिन जिस तरह दिल्ली , कोलकाता ,मुबंई आर्थीक आकर्षण का केंद्र बने हुए है उसी तरह अगर अन्य शहरों या गावों का विकास हो, रोजगार के साधन निर्मीण किये जाए तो स्थानीय लोगों को रोजगार के लिए कहीं और भटकने की जरूरत नही पडेगी। भाषावाद या प्रांतवाद का विवाद ही खत्म हो जाएगा। और ये तब मुमकिन होगा जब हमारे देश के नेता चाहें तभी। करोंडो की संपत्ती जुटाने की होड में लगे नेता अगर आम आदमी की सेवा करना चाहता है तो पहले उसे सम्मान के साथ जीने के साधन मुहैय्या कराये। नेताओं की चापलुसी करके उनके जुते उठाकर मंत्रीपद नही मिलेगा। सम्मान के साथ अपना कर्तव्य निभाए। आवभगत जरूर कीजिए लेकिन उस आवभत से आपके समाज का सम्मान हो ना कि छिं थू........। युवा वर्ग को यह विश्वास है कि भविष्य में युवराज राहुल गांधी देश का विकास जरूर करेंगे, जहां न भाषावाद होगा ना ही प्रांतवाद। मुंबई के सफल दौरा करके उन्होने ये साबित कर दिया, जहांपना तु्स्सी ग्रेट हो..........।