Monday, March 1, 2010

सचिन रमेश तेडूंलकर.....

सचिन रमेश तेन्दुलकर देश में ही नही बल्कि दुनिया भर के लोगों के दिलों में राज करनेवाला एक ऐसा इंन्सान है जो रोज नई उँचाइयों तक पहुँचने के बाद भी उसके पैर अभी भी जमीन पर ही है। अनगिनत सम्मान, अनगित खिताब पानेवाले सचिन की सादगी के सारे यूँ ही कायल है। सचिन को करीब से जाननेवाले उनकी सादगी, नम्रता, विनय और सामाजिक कार्य से बखूबी वाकिफ है। सचिन को सिर्फ टेलीविजन पर देखनेवाले लोग भी सचिन की सादगी से परीचित है। अनगिनत रेक़ॉर्ड बनानेवाले सचिन को भारतरत्न से सम्मानित करने की सिफारिश महाराष्ट्र सरकार, केंद्र सरकार से करनेवाला है,लेकिन सचिन को यह पुरस्कार देने में स्वंय केंद्र सरकार को ही पहल करनी चाहिए उसके लिए किसी की सिफारिश की जरूरत क्यों आन पडती है। सचिन को सिर्फ टेलीवि़जन पर देखने से ही उनके डाउन टू अर्थ स्वभाव का पता चलता है। हाफ सेंच्युरी हो, सेंच्यूरी या फिर डबल सेंच्यूरी सचिन सबसे पहले अपना बल्ला आकाश की ओर उठाकर भगवान का शुक्रिया अदा करते नजर आते है। अपनी हर एक कामयाबी के लिए अपने परिवार अपने सहयोगी खिलाडियों का शुक्रिया अदा किये बिना उनकी सफलता का क्रेडिट उन्होने आजतक खुद नही लिया। उनकी जगह कोई और होता तो अपनी बैट पटकता या फिर उछलकूद करता। किसी भी विवाद में पडना सचिन को बिल्कुल भी पसंद नही फिर भी उन्हे विवादों में खींचा गया। सचिन ने खामोश रहकर अपने बडप्पन का सबूत दे ही दिया। सचिन के ऐतिहासिक रिकार्ड के बाद देश और दुनिया ने उन्हे सर माथे पर बिठा लिया और उनपर उंगली उठानेवाले की उंगलिया उन्ही की दातों तले दबानेपर मजबूर कर दिया। अब उन्ही लोगों ने सचिन को रेकॉर्ड बनाकर इतिहास रचनेवाले सचिन को विक्रमादित्य करार दिया और उन्हे भारतरत्न से नवाजा जाने की सिफारिश भी की है। क्रिकेट के बारें में मुझे बहुत कुछ जानकारी तो नही है लेकिन सामान्य ज्ञान जरूर है। पिछले कुछ दिन पहले सचिन का फॉर्म खराब होने की चर्चा थी, और उन्हे सन्यास लेना चाहिए ऐसी अफवाएँ भी उडने लगी थी, लेकिन सचिन ने नाही इस बात का बुरा माना या कोई टिप्पणी की। अपने बीस साल के करियर में बुलंदी छुनेवाले सचिन ने कभीभी अहम को अपने आस पास भटकने नही दिया। टेनिस एल्बो की शिकायत के बाद भी वो आज भी पाँच पाँच घंटो तक प्रैक्टीस करते है। सचिन के वन डे में 200 रन का इतिहास रचने के बाद महानतम खिलाडियों ने उनकी प्रशंसा में कसीदे पढे है। उन्हें भगवान तक बना दिया। चाहे वो ऑस्ट्रेलियन खिलाडी हो या फिर पाकीस्तानी। शोएब अख्तर ने कहा है की सचिन गेंदबाजो के दुश्मन नही बल्कि गेंद के दुश्मन होते है और वे इस दुश्मनी को बखुबी निभाते भी है। उनकी सफलता, नम्रता देखकर सामान्य व्यक्ति नतमस्तक हो जाए तो कोई अचरज नही होगा। एक महानतम खिलाडी होने के साथ साथ सचिन एक आदर्श बेटा, आदर्श भाई, आदर्श पति के साथ साथ आदर्श पिता भी है। अपने पिता और भाई से मिली सीख को वे अपने बच्चों को भी दे रहे है साथ ही वे अपने बच्चों के जरिये दिए गए सुझावों पर भी अमल करते है। पूरी दुनिया से भर भर कर प्यार पानेवाले सचिन ने अनाथालय के बच्चों में भर भर कर प्यार, खुशियां बांटी है। अनाथालय में प्यार बांटकर समाज का ऋण भी वे चुका रहे है। विक्रमादित्य, क्रिकेट का शहंशाह, क्रिकेट का भगवान कह लो या फिर सचिन को कोई भी खिताब से नवाजा जाए फिर भी यह अनमोल रत्न अपनी सादगी कभी नही छोडेगा। सफलता के शिखर पर खडे रहने के बाद भी इस महान खिलाडी के पैर जमीन पर होने से उनके सामने अपने आप ही सर झुक जाता है।

Tuesday, February 9, 2010

शेर हैं कि बिल्ली...?

राहुल गांधी को काले झंडे दिखाने का आदेश शिवसेना सुप्रिमों बाल ठाकरे ने दिया और उनके आदेश को सर माथे पर लेकर शिवसैनिक गली कुंचे से निकलकर काले झंडे दिखाने के लिए कुछ हद तक सामने भी आए लेकिन बाईस हजार पुलिस कर्मीयों ने उनके प्लॉन को फेल कर दिया, उनके आंदोलन की हवा ही निकाल डाली। साथ ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने रास्ते पर उतर कर उनका सामना करने के लिए कमर कस ली।शायद ये नजारा मुंबई हमले के वक्त देखने मिलता तो आज नजारा ही कुछ और होता ना कि मुंबई पुलिस के जाबांज शहीद होते और ना ही एन.एस.जी के कमांडो जिन्हे मुंबई के लिए निकलने की आज्ञा हमले के दस घंटे बाद दी गयी। राहुल गांधी के मुंबई के सफल दौरे के बाद कार्यकारी अध्यक्ष ने आनन फानन में प्रेस कॉन्फ्रेस लेकर ये साबित कर दिया की राहुल गांधी को उनके वजह से हवाई यात्रा छोडकर रेल का सफर तय करना पडा हालांकि सच्चाई सभी को पता है। शाहरूख खान के बयान पर शिवसेना ने आक्रमक रूख अख्तियार तो कर लिया लेकिन विरोध फिल्म की करे या शाहरूख की इस भ्रम में शिवसेना खुद ही अपने बुने जाल में फँस गयी । हालांकि खेल और कला को इस विवाद में लाना समझदारी नही था। लेकिन मुंबई आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तानी साजिश से सारा देश आहत हुआ है, ऐसें में पाकिस्तान खिलाडियों को आईपीएल में खिलाने का विरोध शिवसेना ने जताया। राज्यसरकार ने शाहरूख को सुरक्षा देने का वादा किया। मुंबई लौटकर शाहरूख ने बालासाहब से मिलने का इच्छा भी जाहीर की और अपने बयान पर कायम रहे। शिवसेना का यह मिशन भी फेल हो गया। ऑस्ट्रेलिया में भारतीयो पर हो रहे नस्लवाद के हमले की वजह से कई भारतीय छात्रों पर जान पर बन आयी है। हमले अभी भी बरकरार है, केंद्र सरकार ऑस्ट्रेलियन सरकार से चर्चा करके भारतीयों पर हो रहे हमले को रोकने की कोशीश में है। आश्चर्य तब और होता है कि जब आस्ट्रेलियाई सरकार ने भारतीय छात्रों को गरीबी दर्शाने की नसीहत दे डाली। स्थानीय ऑस्ट्रेलियन भारतीयों के आने से असुरक्षित तो कम जलन और अपनी काहिलपन को छुपाने के लिए हमले करने लगे हैं। शिवसेना ने इस बात का विरोध जताते हुए ऑस्ट्रेलियन खिलाडियों को मुंबई में आने से विरोध जताया है। लेकिन केंद्रीय कृषीमंत्री श्री शरद पवार बीच बचाव करने आगे आये है। शिवसेना प्रमुख से चर्चा करके इस बात पर हल निकालने की पहल की ही। देश में मंहगाई बढती जा रही है, शक्कर की मिठास मुंह से निकल गयी हा वहीं राष्ट्रवादी के पत्रिका में यह कहा गया है कि शक्कर नही खाने से कोई मर नही जाएगा। इस पर मंत्रालय के साथ सरकार से जुडे लोगों को शर्म आनी चाहिए। डब साबुन का और शक्कर का दाम एक जैसा है, लेकिन उसके बारे में कोई आवाज नही उठाते। राष्ट्रवादी को यह शायद पता होगा की दो वक्त की रोटी का जुगाड करनेवाला इंसान डब साबुन या इत्त्तर का इस्तेमाल नही करता। चाय में शक्कर की मिठास तो जाती रही अब रंग भी फिका हो गया। लेकिन खेल से सभी को प्यार है चाहे वो ऑस्ट्रेलियन खिलाडी हो या पाकिस्तानी सभी को पसंद किया जाता है। पवार जी ने कल महाराष्ट्र के औरंगाबाद में कहा था कि अब बालासाहब की उम्र हो चुकी है, विरोध करके क्या करेंगें बच्चों को खेलने दीजिए, मै उनसे मिलकर उनको समझाउंगा। चर्चा के बाद अब शिवसेना यह तय करेगी की खिलाडियों को विरोध करना है या नही। यह आंदोलन भी खटाई में जाता रहा। क्या शिवसेना का पावर कम हो रहा है, या मराठी –गैर मराठी के विवाद का विभाजन ठाकरे परिवार में हो रहे विभाजन की वजह से मराठी मानुष दुविधा में है कि शिवसेना की राह पर चले या मनसे का हाथ थामे। कौन दिलवाएगा भूमिपुत्रों को न्याय। भूमिपुत्रों को न्याय दिलवाने के लिए साठ साल पहले जो शिवसेना शेर की तरह दहाडा करती थी अब वो मिमियाने लगी है। बॅकफूट पर जाने लगी है। बालासाहब ठाकरे की फिर से एन्ट्री से अगर मुंबई महापालिका चुनाव मे शिवसेना फिर से बाजी मार लेती है तो क्या फिरसे उन्हे सक्रिय राजनिती में उतरकर दहाडना होगा। शिवसेना का वजूद दिखाना होगा।..... लेकिन फिलहाल तो सेना शेर की जगह बिल्ली बनी हुई है।

जहांपना तुस्सी ग्रेट हो....

कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी मुंबई आए, आने से पहले मिली हर चुनौती और चेतावनी का सामना करते हुए मुंबई का दौरा सफल करके दिखा भी दिया। शिवसेना के आंदोलन की हवा निकालते हुए उन्होने यह साबित कर दिया कि मुंबई सभी की है, हर भारतीय मुंबई ही नही बल्कि देश में कहीं भी आ जा सकता है। युवराज देश के भविष्य ही नही बल्कि वर्तमान भी है, हर चुनौती का सामना बडे ही सादगी से करके हर भारतीय नौजवान ही नही बल्कि बुजुर्गो के गले की शोभा के रुप में ताबिज बन चुके है। राहुल गांघी की सादगी और जमीन से जुडे रहने की वजह से सभी उनके कायल है। सबसे अहम बात तो यह है कि दलितों के साथ हो रहे भेदभाव को उन्होने काफी हदतक मिटाने की कोशीश की है। अब तो लगता है कि हर नौजवान युवराज के नक्शे कदम पर चलना चाहता होगा, उनकी तरह सोचने, करने की कोशिश करना चाहता होगा। लेकिन इस मुंबई दौरे का एक दूसरा पहलू भी सामने आया है जो सोचने पर मजबूर भी करता है। राहुल गांघी ने बिहार के लोगों के सामने यह कहकर उनका दिल जीत लिया की मुंबई हमले के दौरान यू.पी –बिहार से आए एन एस.जी कमांडो ने मुंबईकरों को आतंकीयों से बचाया है। राहुल गांधी को कल का नेतृत्व करना है, सभी के दिलों में उनके लिए काफी इज्जत है, लेकिन उनके इस बयान से शायद देश के जवानों में भी मराठी – गैर मराठी की भावना ना पैदा हो जाए। आम मुंबईकरों को या महाराष्ट्रीयन लोगों के मन में ये कतई भेदभाव नही है। राजनीतिक पार्टीयों ने मराठी गैर मराठीयों का विवाद खडा कर दिया है। विवाद खडा करने में सबसे अहम भुमिका निभा रही है मिडीया। बाल की खाल निकालकर, बयानों को बढा चढाकर,तोड मरोडकर पेश किया जा रहा है। लोगों में गलत संदेश दे रहे है। कल की ही बात ले लिजिए राहुल गांधी का रेल सफर...., मुंबई दौरा कामयाब होने के बाद मिडीया ने बाल ठाकरे, राज ठाकरे, उध्दव ठाकरे को मुहं चिढाना शुरू कर दिया, उन्हे उकसाने में कोई कसर नहीं छोडी। राहुल गांधी आम आदमी से जुडे रहने की कोशिश में रहते है, देश का भविष्य पढे लिखे काबिल नौजवानों के हाथों सौपना चाहते है। भारतभर में घूम कर नौजवानों में नया जोश पैदा कर रहे है। मुबंई दौरे के वक्त राहूल गांधी ने हवाई यात्रा छोडकर आम आदमी के साथ जाना पसंद किया ये बात काफी अच्छी लगी , उन्होने रेल यात्रियों के परेशानियों के बारे में भी पूछा। सभी लोग राहुल गांधी को देखने के लिए , उनसे हाथ मिलाने के लिए काफी उत्साहित भी थे। कमांडो के घेरे में रहने के बावजूद भी वे आम आदमी से रूबरू हुए। शिवसैनिक जहां काले झडें दिखा रहे थे वहां आम मुंबईकर चाहे वे मराठी हो या गैर मराठी सभी ने राहुल गांधी का स्वागत किया। लेकिन राहुल गांधी की दो बातें मुझे तो बिल्कुल भी अच्छी नही लगी। राहुल गांधी न अंधेरी से दादर और दादर से घाटकोपर तक का सफर रेल से तय किया उस बात का स्वागत है। लेकिन टिकट के कतार में खडे रहकर टिकट लेना और एटीएम से पैसे निकालना ये बात कुछ रास नही आयी। भले ही उन्होने ये साबित करने की कोशिश की हो, कि मै भी आप लोगों में से एक हूं। आम मुंबईकर की परेशानी कुछ अलग है, उसके पास यह सोचने के लिए वक्त नही की मराठी गैर मराठी के विवाद में शामिल हो या नही। मुंबईकर की दिन की शुरूवात भागते दौडते होती है और समाप्ति भी। समय पर ट्रेन या बस लेकर अपने गंतव्य स्थान पर पहुचने के लिए उसे कितनी जद्दोजहद करनी पडती है यह पीडा मुंबईकरों के अलावा कोई नही जान सकता। आबादी बढ रही है लेकिन खाने पीने की चीजे, आवाजाही के साधन रहने की जगह कम होती जा रही है। चीजों के दाम केवल बढते जा रहे है उत्पादन नहीं। हर इंसान मुंबई को केवल पैसे कमाने का जरीया समझने लगा है, बस आओ और पैसा कमाओ। लेकिन सुंदर मुंबई स्वच्छ मुंबई का नक्शा घिनौना होता जा रहा है, रहने के लिए कहीं पर भी झुग्गियां बनती जा रही है। क्या पालिका प्रशासन को इस बात का पता नही चलता की अवैध झुग्गियों का निर्माण हो रहा है। सबकुछ पता रहता है, लेकिन स्थानीय पार्षदों को झुग्गी के दादाओं से रिश्वत जो मिलती है और फिर सरकार को भी तो वोट चाहिए तो झुग्गियों को सुरक्षा देना लाजमी होता जा रहा है। जगहों के बढते दामों ने आम आदमी के घर के सपने को तोडा ही नही बल्कि चकनाचूर कर दिया है, मुंबई का मिल मजदूर शहर से बाहर हो गया है। कई मिल बंद हो चुकी है और तो कईयों को आग के हवाले कर दिया है। मिल मजदूरों के बच्चे आज या तो क्रिमीनल बन गये है, या तो कहीं दिहाडी मजदूर बनने पर मजबूर है। बरसों से उनको मिल रहा है तो केवल आश्वासन मिल की जगह घर और बच्चों को नौकरी। सालों बीत गये अब और कितने साल बीताने होंगे शायद भगवान ही जाने। देश सभी का है किसी को भी कहीं भी जाने का अधिकार है, कमाने खाने का अधिकार है, लेकिन जिस तरह दिल्ली , कोलकाता ,मुबंई आर्थीक आकर्षण का केंद्र बने हुए है उसी तरह अगर अन्य शहरों या गावों का विकास हो, रोजगार के साधन निर्मीण किये जाए तो स्थानीय लोगों को रोजगार के लिए कहीं और भटकने की जरूरत नही पडेगी। भाषावाद या प्रांतवाद का विवाद ही खत्म हो जाएगा। और ये तब मुमकिन होगा जब हमारे देश के नेता चाहें तभी। करोंडो की संपत्ती जुटाने की होड में लगे नेता अगर आम आदमी की सेवा करना चाहता है तो पहले उसे सम्मान के साथ जीने के साधन मुहैय्या कराये। नेताओं की चापलुसी करके उनके जुते उठाकर मंत्रीपद नही मिलेगा। सम्मान के साथ अपना कर्तव्य निभाए। आवभगत जरूर कीजिए लेकिन उस आवभत से आपके समाज का सम्मान हो ना कि छिं थू........। युवा वर्ग को यह विश्वास है कि भविष्य में युवराज राहुल गांधी देश का विकास जरूर करेंगे, जहां न भाषावाद होगा ना ही प्रांतवाद। मुंबई के सफल दौरा करके उन्होने ये साबित कर दिया, जहांपना तु्स्सी ग्रेट हो..........।

Wednesday, January 20, 2010

अब की बारी दूध.....

केंद्रीय कृषी मंत्री श्री शरद पवार का एक और बयान, जो मुनाफाखोरो के लिए वरदान साबित होगा। पहले चावल, फिर दाल बाद में गाज गिरी चीनी पर अबकी बारी है दुध की । शरद पवार जी का बयान है की भविष्य में दूध की किल्लत होगी याने दूध महंगा होगा । धिरे धिरे आम आदमी के मुंह से बचा कुचा निवाला भी छिने जाने की तैय्यारी। एनसीपी नेता तारीक अन्वर कह रहे है की शरद पवार एक जिम्मेदार व्यक्ती है और किसी भी चिज की किल्लत होगी तो वो चिज महंगी तो होनी ही है। भारत दूध उत्पादन में नंबर एक पर है, वावजूद इसके लोगों को एक लिटर दूध के लिए 40 रूपये देने पडते है। अभी यह हाल है तो शरद पवार के बयान के बाद दूध के दाम आसमान छुने लगेंगे। बच्चों के मुंह से दूध की प्याली छिन जाएगी। चलिए हम विश्वास रखते है की भले ही कृषीमंत्रीजी की यह बिल्कूल भी मंशा नही होगी की जरूरी चिजों के दाम बढे लेकीन उनके बयान आम आदमी की कमर तोड रहा है। चिनी के दाम बढने से चाय की मिठास पहले से ही कम हूई थी अब रंग भी फिका हो जाएगा। वैसे भी गरीब आदमी चाय पीकर अपनी भुख को दबा रहा है। मंहगाई के मुद्दे पर तो मायावतीजी ने श्री शरद पवार को मंत्रीमंडल से हटाने तक की मांग कर डाली । दुसरे दिन पवार साहब अपने बयान से मुकरे जरूर है लेकीन महाराष्ट्र में इसका असर जरूर हो गया है। गोकुल दूध के दाम प्रती लिटर २ रूपयोंसे जरूर बढे है। आमदनी अठ्ठनी और खर्चा दो रूपया हो गया है। मंत्रीजी से यह बिनती है की आप भविष्यवाणी करके आम आदमी के मुह का निवाला तो मत छिनीए।

Tuesday, January 12, 2010

मंत्रीजी मांगे मोर.....

बढती महंगाई ने आम आदमी की पहले से ही कमर तोड दी है। राशन का खर्चा, घर का किराया, बच्चो की फीस का खर्चा निकालकर कुछ सेव्हींग करना मुश्कील बात है फिर भी मुंबई में बसेरा हो यह सबकी चाहत होती है । आम आदमी का मुंबई में घर खरीदने का सपना महज सपना ही रह गया है। घर का सपना आम मुंबईकरों को शहर से दूर ले गया है। आमदनी अठ्ठनी और खर्चा रूपय्या ऐसी हालात में गुजर बसर करना लाजमी हो गया। मंहगाई की मार ने तो दो वक्त के खाने में कजुंसी करने पर मजबूर कर दिया है। लेकिन महाराष्ट्र सरकार करोडो रूपयों के वारे न्यारे कर रही है, वो भी जनता के पैसो पर। महाराष्ट्र सरकारने मंत्रीयों के केबीन को नया लूक देने का काम शुरू कर दिया है। एक एक केबीन के रिनोवेशन का खर्च है 10 लाख से लेकर 25 लाख रूपये। एक केबीन के खर्च में एक परिवार अपना घरौंदा बना सकता है। एक और जहां सरकार करोडो रूपयों के कर्ज तले दबी है, वहीं दुसरी और लोगों का पैसा पानी के तरह बहाया जा रहा है। मंत्रालय को अब कॉर्पोरेट लूक चाहिए। एसी केबीन में बैठकर किसानो और पीडीतों का दुख दर्द सुना जाएगा। किसानों की फसल की नुकसान की चर्चा अब मंहगी केबीन में बैठकर की जाएगी। मुंबई महाराष्ट्र की जनता महंगाई, बेमोसमी बारीश, बेरोजगारी से त्रस्त है, वहीं सरकार करोडो रूपये खर्च करने में मस्त है। केंद्रीय कृषीमंत्री ने ये कहकर अपना पल्ला झाड लिया की चीनी के दाम कब कम होगें यह कहने के लिए मै कोई ज्योतिषी नही हू। कृषीमंत्री का यह बयान मुनाफाखोरों की जेबे भर रहा है। मुनाफाखोर तो बस इसी ताक में है की कब सरकार यह ऐलान करे की महंगाई पर काबू नही पाया जा रहा है और कब वे अपने गोदाम में रखे माल को दुगने तिगुने दाम में बेचकर मालामाल हो जाए। कृषीमंत्रीजी को ज्योतिषी नही बनना है तो ना सही लेकिन कम से कम एक अच्छा मंत्री बनकर लोगों के दुख को दूर नही लेकिन कम तो जरूर कर सकते है। आतंकी हमले से निपटने के लिए मुंबई पुलिस को आधुनिक हथियारों से लैस करने करने की कवायद तो हो रही है, लेकिन अभीभी नक्षल प्रभावित क्षेत्र में पुलिस को अपनी जान की बाजी लगाकर शहिद होना पड रहा है। उनके पास ना तो आधुनिक हथियार है नाही जंगल का मुआयना करने के लिए हेलीकॉप्टर। मंत्रीयों में जरासी भी संजीदगी बची हो तो पुलिस बल को सक्षम करे, महंगाई कम करने के लिए ठोस उपाय ढूंढे । अलिशान केबिन में बैठकर मगरमच्छ के आसुं मत बहाईये।

Tuesday, January 5, 2010

बच्चे का दोस्त बनिए

नये साल का चौथा दिन कईयों ने नये साल के लिए अलग –अलग प्लान बनाये होंगे, कईयों ने नया कुछ करने का संकल्प किया होगा। मुंबई ने नये साल का स्वागत जोशो खरोश में किया । आतंकीयों के हमले में पिछले साल सहमी मुंबई नये साल में फिर एक बार नये सिरे से पुरी ताकद के साथ खडी हूई। लेकिन नये साल की खुशियों में सराबोर मुंबई पर सोमवार को जैसा मातमसा छा गया । दिन एक घटनाएं तीन मुंबई में अलग अलग तीन जगहों पर दो छात्राएं और एक छात्र ने आत्महत्या की। तीनो छात्रों ने एक ही तरीका अपनाया फांसी का फंदा। मुंबई से सटे डोंबिवली में छठी कक्षा में पढनेवाली नेहा ने मौत को गले लगाया। नेहा पढने में तो होशियार थी साथ ही नृत्य में भी निपूण। नृत्य के लिए उसे कई अवार्ड भी मिल चुके है। नेहा का पढाई में ध्यान लगने के लिए उसका डान्स क्लास बंद कराया गया। बस यही कारण था नेहा ने घर में फांसी ले ली। नेहा उसका डान्स बंद नही करना चाहती थी, यह सदमा वो सह नही पायी और उसने मौत को गले लगाना पसंद किया। दूसरा वाकया दादर के शारदाश्रम स्कूल का है। सातवी कक्षा में पढनेवाले सुशांत ने स्कूल के टॉयलेट में फांसी लगाकर आत्महत्या की। सेकंड सेमिस्टर में सुशांत चार सब्जेक्ट में फेल हो गया । वहीं तीसरी आत्महत्या की है पवई में रहनेवाले भजनप्रीत कौर ने। एमबीबीएस के पहली वर्ष की छात्रा भजनप्रीत के परिक्षा में कम नंबर आये थे। एक दिन में घटी तिनों घटनाओं को देखकर मुंबई दहल गयी। अभिभावक दहशत में है। प्राथमिक अनुमान निकाला जाए तो छात्रों की आत्महत्या के पिछे का कारण है पढाई का बोझ, और परिवारवालों की बढती अपेक्षा। अभिभावकों को लगता है की अपना बच्चा पढाई में अव्वल हो, समाज में उसे उचीत सम्मान मिले। लेकिन वो भूल जाते है की उनके बच्चा रेस में दौडनेवाला घोडा नही है। बच्चों पर पढाई का बोझ लादना सरासर गलत तो है ही लेकिन बच्चों के साथ संवाद का अभाव भी एक कारण है। बच्चों के उज्वल भविष्य के लिए माता- पिता दोनो को नौकरी करना अनिवार्य हो गया है। अभिभावक पैसा कमाकर बच्चों की जरूरतों को पुरा कर रहे है, लेकिन इस व्यस्तता में वे भूल रहे है की बच्चों से बैठकर बात करना उनकी मानसिकता समझना बेहद जरूरी है। बच्चों की कमजोरी पर उन्हे डांटकर नही बल्की उनकी परेशानियों का हल निकालना जरूरी है। साथ ही टिचर्स ने भी बच्चों की कमजोरीयों को भांपना जरूरी है। बच्चों में हो रहे बदलाव पर नजर रखकर उसे उचीत समय पर डॉक्टर को दिखाना होगा। बच्चों के दोस्त बनिए, अपनी इच्छा के बोझतले उन्हे मत दबाईये। उनके अंदर छुपे गुणों को बढावा दिजीए। आपका बच्चा सही मायने में मानसिक और शारीरीक रूप से स्वस्थ रहेगा और कामयाबी को चुमेगा।

Monday, January 4, 2010

करियर का विनाश- रैगिंग

मुझे आज भी याद है कॉलेज को वो दिन, एडमिशन लेते वक्त काफी खुशी थी, कैसा होगा कॉलेज, स्टुडेन्टस कैसे होगे, टिचर्स कैसे पढाएंगे इस बात का एक्साईटमेंट था। लेकिन जब कॉलेज का पहला दिन आया तो कॉलेज जाने से डर लगने लगा। डर पढाई का नही था बल्कि रैगिंग का नाम सुन रखा था। कुछ साल पहले भी कॉलेज में रैगिंग का चलन था, लेकिन आज जिस तरह वहशियाना है उस तरह का नजारा पहले नही था। कॉलेज में सिनीअर्स ज्युनियर्स का मजाक उडाते थे, वह मजाक केवल मजाक तक ही सीमित रहता था। बाद में सिनिअर्स ज्युनिअर्स को अपने नोटस देकर उन्हे पढाई करने का तरीका भी सिखाते थे। लेकिन आज का दौर काफी आगे निकल गया है। नयी नयी तकनीक से लैस छात्रों को छेडछाड के नये नये तरीके आसानी से मिल रहे है। आज पढने पढाने का तरीका, रहन सहन का तरीका बिल्कुल बदल चुका है। छात्रों से बदसलूकी करना, लडकियों से छेडछाड करना आम बात हो गयी है। रैगिंग का विभत्स रूप सामने आ रहा है। अश्लीलता ने अपने हाथ पांव पसारे है। और अश्लीलता का शिकार बन रहे है मासूम छात्र। पैसा और तकनीक को इन्सानियत से ज्यादा जगह मिल रही है। रैगिंग के शिकार सैकडों बच्चो ने आत्महत्या करके मौत को गले लगा लिया वहीं कई बच्चों की मानसिक हालात ठीक नही है, उनकी जिंदगी पुरी तरह से बर्बाद हो गयी है। सुप्रीम कोर्ट ने रैगिंग के खिलाफ ठोस कदम उठाने के निर्देश भी दिए है बाबजूद ऐसी घटनाओं में कमी नही आ रही है। रैगिंग के खिलाफ कानूनी कारवाई तो हो रही है, लेकिन जो छात्र उसका शिकार हो रहे है उनकी जिंदगी का खामियाजा कोन देगा। फिल्में देखकर उसमें दिखायी गयी निगेटिव बातों को अमल में लाना सरासर बेवकूफी है। फिल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए देखें ना ही उसका दुरूपयोग करने के लिए। ज्युनिअर्स से मजाक मस्ती जरूर करें लेकिन सिनिअर्स होने के नाते उनकी रक्षा करना आपकी जिम्मेदारी बनती है। संस्कार सफलता की कुंजी है, उसे खो देने से जीवन पार तो हो जाता है लेकिन सफल नही होता। छात्र भी यह जान ले की अन्य छात्रों को मारपीट करके या उनसे अश्लील हरकते करवाकर उनका तो कुछ फायदा नही होगा बल्कि खुद उनका ही करियर बर्बाद होगा। विद्या के मंदीर को कलंकित करने से मंदीर पर काला धब्बा तो लग ही जाता है लेकिन दुष्कर्म करनेवाले को सजा भी जरूर मिलेगी। के. ई.एम के 18 छात्रों के खिलाफ पुलिस केस बन चुका है, उन्हे पढने की इजाजत तो दी गयी है, लेकिन उन्हे हॉस्टल से धक्का मारकर निकाला गया । पढाई के लिए मिलनेवाला पैसा भी हाथ से निकल गया साथ ही अब वो किसी भी कॉम्पीटिशन में हिस्सा नही ले पायेंगे। इस सब घटनाओं मे उन मां बाप का क्या कसूर जिन्होने अपना पेट काटकर, कर्ज लेकर मेडिकल में अपने बच्चे का दाखिला करवाया है, वो कहां से लाये पढाई के लिए ढेर सारा पैसा। रैगिंग करना आसान है, लेकिन उसका खामियाजा भुगतना दर्दनाक है। कॉलेज लाईफ जरूर एन्जॉय किजीए लेकिन गलत इरादों को फलने फूलने ना दें।